भारत यात्रा केंद्र से इंदौर वापसी
ऋषिकेश राजोरिया
भोंडसी में जुलाई 1984 के किसी दिन की बात है। सोलंकी के दुर्व्यवहार से मन खट्टा हो चुका था। शाम के समय चंद्रशेखर पदयात्रियों के साथ अपनी झोंपड़ी के आंगन में बैठे थे। आगे की योजनाएं बना रहे थे। उन्होंने मुझ से पूछा, अब क्या करना है? मैंने कहा, आपका आदेश। यहीं रहना है तो हजार आठ सौ रुपए महीना वेतन तय कर दीजिए, घर भेजता रहूंगा। उन्होंने हंसते हुए मजाक में कहा, तुमको हजार आठ सौ रुपए महीने कौन देगा? मजाक में कही गई उनकी बात मेरे मन में तीर की तरह लगी।
हालांकि वहां पैसे की कमी नहीं थी। सारी व्यवस्था माधवजी संभालते थे। केंद्र के लिए बहुत सा सामान आता था। पदयात्रियों के रहने का इंतजाम होता था। बिजली, फोन, सारी सुविधाएं जुटा ली गई थीं। लेकिन कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं थी कि आगे क्या होगा। भारत यात्रा केंद्र का कोई स्पष्ट एजेंडा सामने नहीं आया था। जो कुछ भी था, वह चंद्रशेखर के दिमाग में था। ज्यादातर पदयात्री अपने पैसे साथ लेकर आते थे। जिनके पास पैसे नहीं होते थे, उन्हें जरूरत होने पर माधवजी उपलब्ध करा देते थे। मेरी स्थिति अलग थी। मैं घर से पैसे नहीं ला सकता था। किसी से मांगने में बेहद संकोच होता था।
उस शाम चंद्रशेखर के जाने के बाद मन में उदासी सी छा गई। तुमको हजार आठ सौ रुपए कौन देगा, यह सवाल मन में बार बार उठता रहा और मैं बेचैन होता रहा। सुबह होते होते तय कर लिया कि निकल लेना चाहिए। माधवजी से कहा, बारिश में अब मैं यहां क्या करूंगा? जाने का कार्यक्रम बन गया। इंदौर जाने से पहले मुलाना गया। तेजिंदर प्रकाश के यहां। वह निमंत्रण देकर गया था। दो दिन उसके यहां रहा। उसके बाद इंदौर। यह सोचकर कि अब कहीं नहीं जाना है। अपने दम पर कोई काम खोजकर जीविका चलानी है। चंद्रशेखर ने ऐसी बात कैसे कह दी कि हजार आठ सौ रुपए कौन देगा?
भोंडसी में गुजरा समय रह रह कर याद आने लगा। कितनी तेज गति से झील का निर्माण हो गया। कितने सारे लोग मिले। भंवर सिंह की विशेष याद आई। वह एक बलिष्ठ व्यक्ति था। जीवन में काफी झंझावातों से गुजरा था। उसने हरियाणा के भिवानी में कॉलेज के छात्र संघ का चुनाव लड़ा था और सुरेन्द्र सिंह को हरा दिया था, जो तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल का बेटा था। उसके समर्थकों ने सुरेन्द्र की पिटाई अलग कर दी थी। इसके बाद हरियाणा पुलिस ने भंवर सिंह पर भारी अत्याचार किए थे। रियासी गांव में उसका घर जला दिया, जिसमें उसकी नानी की जलने से मौत हो गई। भंवर सिंह और उसकी बहन को प्रताडित किया। बाद में देवीलाल की सरकार बनने पर वह किसी निगम का अध्यक्ष बनाया गया। भजनलाल की सरकार में भी उसे कोई अहम पद मिला हुआ था, लेकिन जब भजनलाल ऐतिहासिक दलबदल के जरिए कांग्रेस में चले गए, तब भंवर सिंह ने कांग्रेस में जाने से इनकार कर दिया और पद छोड़कर चंद्रशेखर के साथ जुड़ गया। वह महाराष्ट्र में किसी जगह से उस समय पदयात्रा में शामिल हुआ था, जब उसके खिलाफ हरियाणा में वारंट निकला हुआ था।
बंबई का दिलीप छेड़ा, जो बिपिन भाई के साथ मुंबई से पदयात्रा में शामिल हुआ था, उसका अपनी पत्नी से विवाद चल रहा था। वह अदालतों में वकीलों के पास काम करता था। अच्छे पैसे कमाता था, लेकिन उसकी निजी जिंदगी अस्त व्यस्त थी। बिपिन भाई जो चेंबूर में रहते थे और कहीं से एक ट्रक लाकर पदयात्रा में शामिल हुए थे, उन्होंने पदयात्रा के बाद गुजरात के मोरबी में बाढ़ आने पर बंबई में संपन्न गुजराती इलाकों में ट्रक घुमाकर दो दिन में साठ हजार रुपए से ज्यादा चंदा इकट्ठा कर लिया था। ट्रक पर जनता पार्टी का झंडा लगा था। लोगों ने यह समझकर दान दिया कि यह चंदा बाढ़ पीडितों को भेजा जाएगा। ट्रक भरकर पुराने कपड़े भी इकट्ठा हो गए थे, जो बाद में बेच दिए गए। बिपिन भाई ने उस पैसे से चेंबूर में एक हाल बुक करवाया, पोस्टर छपवाए और चेंबूर, कुर्ला में जगह जगह चिपकाए। उसके बाद एक कार्यक्रम हुआ, जिसमें बंबई के नेता शांति पटेल के हाथों उन पदयात्रियों का सम्मान किया गया, जो चंद्रशेखर की पदयात्रा में शामिल हुए थे। ये तीन पदयात्री थे, बिपिन संगार, केटी केनिया और दिलीप छेड़ा। यह घटनाक्रम मैंने चंद्रशेखर को बताया था तो उन्होंने कहा था, अच्छे आदमी कहां मिलेंगे, जो लोग हैं, उन्हीं से काम चलाना पड़ता है। यह बात उनके लंबे राजनीतिक अनुभव का निचोड़ मालूम पड़ती थी, जो अब भी कई बार याद आती है। सुधीन्द्र भदोरिया थे, जो मुझसे स्नेह रखते थे और चंद्रशेखर के काफी नजदीकी थे। उन पर पदयात्रा के दौरान भारी दारोमदार था। वे दिल्ली में मुझे स्कूटर पर घुमाते थे और उन्होंने रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं की मोटी किताब भेंट में दी थी। इन तमाम यादों को समेटे हुए मैं फिर इंदौर पहुंच गया था। अपने घर।


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