झील का निर्माण

                                                                                            ऋषिकेश राजोरिया 


चंद्रशेखर ने भोंडसी में जो झील बनाने की पहल की, वह मेरे लिए ही नहीं, उन सभी के लिए अद्भुत अनुभव था, जो चंद्रशेखर के साथ पदयात्रा के माध्यम से अनायास जुड़ गए थे और उनमें से कुछ भोंडसी में उस स्थान पर मौजूद थे, जहां निर्माण कार्य चल रहा था। अगर यह काम सरकार के स्तर पर होता तो पहले जमीन का सर्वे होता। सर्वे की रिपोर्ट बनती। इंजीनियर उस पर दस्तखत करते। प्रस्ताव बनता। राशि आबंटित होती। इंजीनियर की नियुक्ति होती। काम शुरू होने से पहले इंजीनियर के रहने के लिए मकान बनते। उसके बाद काम शुरू होता या टलता, जो भी होता, लेकिन दो महीनों में एक झील बनना संभव नहीं था।


चंद्रशेखर ने जमीन देखी। एक इंजीनियर को बुलाया और उपलब्ध साधनों से काम शुरू कर दिया। झील बनाने में डॉक्टर बाली के प्रमुख सहयोगी थे मैं और तेजिंदर प्रकाश। दोनों ही विज्ञान तो पढ़े हुए थे, लेकिन इंजीनियरिंग नहीं। फिर भी हम सिविल इंजीनियर की तरह काम कर रहे थे। अरावली पर्वत श्रृंखला के एक हिस्से की घुमावदार पहाड़ी के दो सिरों को जोड़कर एक बड़ा सा स्टॉप डैम बन रहा था। हर साल यह होता था कि बारिश में इन पहाड़ियों के जरिए बहुत सा पानी नालों के रूप में बह जाता था और रास्ते में खेतों को नुकसान पहुंचाता था। स्टॉप डैम के जरिए उस पानी को रोकने का लक्ष्य था।


बांध के एक तरफ झील बन गई, दूसरी तरफ एक छोटा सरोवर मछली पालने के इरादे से बना लिया गया। उस छोटे से सरोवर के किनारे चंद्रशेखर की झोपड़ी थी। जिसका एक दरवाजा सीधे बांध की तरफ खुलता था। झोपड़ी के सामने छोटा सरोवर, उसके बाद कुआं और उसके बाद वह मंदिर, जो पहले से मौजूद था। कितना पुराना था, पता नहीं, लेकिन उसमें किसी देवी देवता की मूर्ति नहीं थी। शायद वह मंदिर प्राचीन काल में किसी साधु ने अपने रहने के लिए बनाया होगा। भारत यात्रा केंद्र बनने से दिल्ली से भोंडसी तक का ट्रैफिक बढ़ गया। कई लोग दिल्ली से भोंडसी पहुंचने लगे। वे गुड़गांव पार करते, फिर बादशाहपुर से कुछ आगे बाईं तरफ इंटीरियर में कुछ दूर भारत यात्रा केंद्र पहुंचते।


सड़क के पास भारत यात्रा केंद्र का बोर्ड लगा दिया गया था। माधवजी के मार्गदर्शन में काम चल रहा था। चंद्रशेखर आते जाते रहते थे, लेकिन उनका ज्यादातर समय भोंडसी में ही गुजरता। भारत यात्रा केंद्र बनाने के लिए उन्होंने राजनीतिक संपर्क कम कर दिए थे। दिल्ली में उनके सचिव थे चतुर्भुज गौतम। चंद्रशेखर की तरफ से उनकी राजनीतिक जिम्मेदारियां वही संभाल रहे थे। भोंडसी राजपूतों का गांव था और अकलीमपुर ब्राह्मणों का गांव था। भारत यात्रा केंद्र को लेकर यह एक अलग गणित बना, क्योंकि चंद्रशेखर राजपूत थे। हालांकि पदयात्रा से अब तक मैंने उनके व्यवहार में किसी तरह का जातिवाद नहीं देखा था, लेकिन उनके छोटे भाई जातिवादी थे।


भारत यात्रा केंद्र में उनके भाई भतीजों का जातिवादी दखल बढ़ रहा था, जिसके तहत सोलंकी जैसे लोगों ने पैठ बनाई। वह एक तरफ वह चंद्रशेखर को साधता। दूसरी तरफ उनके भाई से मेलजोल बढ़ाता। खुद पता नहीं कहां से क्या कांड करके आया था। जब झील बन गई, कमरे बन गए, रहने की व्यवस्था अच्छी होने लगी, तब सोलंकी अपनी तथाकथित पत्नी के साथ भोंडसी आ गया और वहां अधबने कमरों में से एक में अपना निवास बना लिया। पहले यह तय था कि भोंडसी में सभी शाकाहारी रहेंगे, लेकिन बाद में दिल्ली से कुछ लोग आकर यहां कभी कभी पिकनिक करने लगे।


चंद्रशेखर ने पदयात्रा और भारत यात्रा केंद्र से जुड़े मामलों से अपने परिवार को बिलकुल अलग रखा था, लेकिन वह पूरी तरह संभव नहीं था। राजपूत पदयात्री जातिवाद के आधार पर चंद्रशेखर के भाई भतीजों से नजदीकी बढ़ाने लगे थे। करीब बीस लोग भोंडसी में स्थायी रूप से रहने लगे थे। भोंडसी के साथ ही देश में कुछ अन्य स्थानों पर भी भारत यात्रा केंद्र बनने लगे थे। एक महिला सूबी मान भी कुछ दिन भोंडसी आकर रही। बापू कालदाते भी आए। उप्र से ओमप्रकाश श्रीवास्तव पधारे। भारत यात्रा केंद्र के रोजमर्रा के काम संभालने वालें में माधवजी की अगुवाई में उमेश चतुर्वेदी, भंवर सिंह, अरुण चौहान आदि प्रमुख थे। देखते ही देखते झील का निर्माण पूरा हो गया। डॉक्टर बाली अपना काम पूरा कर लौट गए। हरियाणा के पदयात्री भी अपने घर लौट गए। बाकी भी लौटने के प्रयास में जुटे। मैं भी इंदौर लौटने के बारे में सोचने लगा, क्योंकि बारिश के दौरान यहां ज्यादा काम नहीं होने वाला था।