भारत यात्रा केंद्र की शुरुआत

ऋषिकेश राजोरिया 

अप्रैल 1984 की सुबह उस निर्जन और बीहड़ जैसे स्थान पर देखीजहां चंद्रशेखर भारत यात्रा केंद्र बनाने वाले थे। पूरब की तरफ भोंडसी गांव था। वहां से सीधे पहुंचना हो तो एक पहाड़ पार करना होता था या फिर मुख्य सड़क पर पहुंचकर वहां से भोंडसी जाना होता था। पश्चिम की तरफ अकलीमपुर गांवउसके पास ठिकरी गांव। अरावली पर्वत श्रृंखला की घुमावदार पहाड़ी का एक सिरा अकलीमपुर गांव के किनारे पर था। चंद्रशेखर पहाड़ी के दो सिरों को बीच में जोड़कर एक झील बनाना चाहते थे। गुड़गांव से यहां तक सड़क मार्ग से पहुंचने के लिए सोहना रोड पर बादशाहपुर गांव के कुछ आगे से दाईं तरफ एक रास्ते से आगे बढ़ना पड़ता है। इस रास्ते के बाईं तरफ राजपूताना राइफल्स का चांदमारी क्षेत्र थाजहां जवान फायरिंग का अभ्यास करते थे।

काम शुरू करने से पहले चंद्रशेखर ने काफी इंतजाम कर लिए थे। एक तंबू में रसोईघर बना दिया थाजिसे गुप्ता नामक व्यक्ति संभालता था। पानी का इंतजाम कुएं से हो जाता था। बिजली की व्यवस्था कर ली गई थी। भोंडसी के सरपंच ओमपाल सिंहमास्टर महिपाल सिंह और एक कैप्टन नामक व्यक्ति का सक्रिय सहयोग था। सुबह अकलीमपुर और ठीकरी से करीब बीसेक मजदूर बुला लिए गए। मधुरेश ने मजदूरों से काम कराने और हाजिरी लगाने के लिए एक रजिस्टर संभाल लिया। सबसे पहले मजदूरों से झाड़ झंखाड़ साफ कराने का काम शुरू कराया। वहां कुछ मकान भी बनाने थे। पदयात्रा का एक साल 25 जून को पूरा होने वाला था। चंद्रशेखर चाहते थे कि तब तक इस जगह को इस तरह विकसित कर लिया जाएजिससे कि यहां पदयात्रियों का सम्मेलन हो सके। काम तेजी से शुरू हो गया।

हरियाणा से कुछ पदयात्री आ गएजिनमें तेजिंदर प्रकाशअजीत सिंह आदि प्रमुख थे। उमेश चतुर्वेदी और भंवर सिंह भी आ गए थे। बिहार से अयूब भाई आ गए। बुलंदशहर से माधवजी आ गए थेजिन्हें वहां चंद्रशेखर की तरफ से प्रभारी माना जा सकता था। चंद्रशेखर ने एक बुलडोजर किराये पर बुलवा लिया थाजो जमीन समतल करने में काम आ रहा था। सबसे पहले मंदिर के आसपास रहने लायक दो तीन कमरे बन गए। कुछ दूर चंद्रशेखर के लिए एक झोपड़ी बनने लगी। एक और दालान जैसी जगह बनने लगी। केरल और तमिलनाडु के कुछ पदयात्री भी आ गए थेजिनमें रोजलीन भी शामिल थी। इस बीच जगह को विकसित करने के लिएझील बनाने के उद्देश्य से चंद्रशेखर ने सतीश गुजराल को बुलाया। उन्होंने दौरा कर उपयोगी सुझाव दिए। सतीश गुजराल कलाकार थे और इंद्रकुमार गुजराल के भाई थे।

मैं कई तरह की परिस्थितियों में रह चुका था। फिर भी यहां की परिस्थिति मेरे लिए एकदम नई थी। यहां मैंने अपने हिसाब से अपनी दिनचर्या तय कर ली। रोजाना सुबह सूर्योदय देखने के लिए पहाड़ पर चढ़ जाता था। उगते सूर्य के दर्शन करने के बाद नीचे उतरकर स्नान करता और जहां जरूरत होतीवहां काम करने लगता। क्या करना हैक्या नहीं करना हैइसके कोई निर्देश नहीं थे। काम युद्ध स्तर पर हो रहा था और जो बीस पच्चीस पदयात्री वहां जुटे थेवे स्वप्रेरणा से अपना योगदान दे रहे थे। वहां बिच्छू बहुत निकलते थेजिसे सावधान रहने की जरूरत होती थी। वहां सबको भोजन करना थाकाम करना थाकोई पैसा नहीं मिलने वाला था।

चंद्रशेखर ने झील बनाने के लिए डॉक्टर बीएस बाली को बुलायाजो स्टॉप डैम बनाने के विशेषज्ञ थे और विदेश में भी काम कर चुके थे। डॉक्टर बाली ने पहाडियों की स्थिति देखी और स्टॉप डैम बनाने के लिए तैयार हो गए। काम शुरू कर दिया। उनके दो प्रमुख सहयोगी बने तेजिंदर प्रकाश और मैं। साथ में अकलीमपुर का मजदूर कृष्ण कुमार। डॉक्टर बाली काफी उम्रदराज थे। रोजाना सुबह पानी और भोजन साथ लेकर आते थे। चंद्रशेखरक ने एक और बुलडोजर मंगवा लिया थाजो सरकारी था। उस समय भजनलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे। मैं और तेजिंदर प्रकाश  डॉक्टर बाली के आने से पहले तैयार हो जाते। फिर पहाड़ी के दोनों सिरों को नापनाकहां कितनाकिस तरह मिट्टी का भराव करना हैइसका गणित।

सबसे पहले उस क्षेत्र के सभी पेड़ कटवा दिए गए। फिर बुलडोजर से भराव शुरू। हमारे पास थ्रेडोलाइट होताजो जमीन की पैमाइश में काम आता है। कृष्ण कुमार कुछ दूर एक पैमाना लेकर खड़ा होता। मैं थ्रेडोलाइट से देखकर बताता कि कहां तक भराव होना है वहां निशान लगाने के लिए लकड़ी गाड़ देते। इस तरह स्टॉप डैम बनने का काम शुरू हुआ। देश भर में खबर फैल गई कि चंद्रशेखर कुछ कर रहे हैं। कई लोग देखने के लिए भोंडसी आने लगे। वह बीहड़ स्थान जबर्दस्त हलचल वाली जगह में तब्दील हो गया था। पदयात्रियों के बीच आपसी राजनीति शुरू हो चुकी थी। दिल्ली के 3, साऊथ एवेन्यू लेन में रहने वाले चंद्रशेखर के परिवार के लोगों के दखल की भी शुरूआत हो चुकी थी। वे और उनके मित्र  कभी कभी पर्यटन के उद्देश्य से भोंडसी पहुंचने लगे थे। कुछ पदयात्री उनसे जान पहचान बढ़ाने लग गए। जातिवादी राजनीति शुरू हो गई।

उसी दौरान निर्माणाधीन भारत यात्रा केंद्र देखने के लिए बीजू पटनायकजार्ज फर्नांडीसअंबिका सोनी आदि नेता पहुंचेतो उनके आने से पहले चंद्रशेखर ने मोटर चलवाकर पूरे मैदान में कीचड़ करवा दिया था। उनकी इच्छा थी कि उन नेताओं के पैर कीचड़ में अवश्य पड़ने चाहिए। इस तरह चंद्रशेखर गजब के शरारती भी थे और उच्च स्तर की शरारतें किया करते थे। दो महीने में उस जगह की कायापलट हो गई। वहां एक झील बन गईजिसमें पानी भरना बाकी था। बारिश का इंतजार था। चंद्रशेखर की झोपड़ी बन गई थी। पदयात्रियों के रहने के लिए कमरे बन गए थे। बीहड़ गायब हो चुके थे। कई पेड़ लगा दिए गए थेजिनमें रोजाना पानी दिया जाता। वे पेड़ भी बड़े होने लगे थे। कुछ जमीन खेती करने के लिए विकसित कर ली गई। चंद्रशेखर रात दिन इस कार्य में व्यस्त रहते थे। लगता थाजैसे संसदीय राजनीति से उनका मन ऊब गया हो। भोंडसी ग्राम पंचायत क्षेत्र का 36 एकड़ जमीन का वह बेकार हिस्सा अच्छे खासे रिसोर्ट में तब्दील होने की तरफ अग्रसर था। 25 जून 1984 को भारत यात्रा की पहली वर्षगांठ पर पदयात्रियों के पहले सम्मेलन की तैयारी हो चुकी थी।