पदयात्रा का दिल्ली में प्रवेश
ऋषिकेश राजोरिया
चंद्रशेखर की पदयात्रा ने 25 जून 1983 को धूमधाम से दिल्ली में प्रवेश किया। उस समय करीब ढाई सौ स्थायी पदयात्री थे, जिनके ठहने का इंतजाम चौहान धर्मशाला और आईआईपीए (भारतीय लोक प्रशासन संस्थान) के होस्टल में किया गया था। हजारों की संख्या में लोग साथ चल रहे थे। रामलीला मैदान पर चंद्रशेखर का सार्वजनिक अभिनंदन हुआ, जिसमें देवीलाल, रामकृष्ण हेगड़े, इंद्रकुमार गुजराल, राजनारायण सहित कई नेता मंच पर उपस्थित थे। रामलीला मैदान खचाखच भरा हुआ था। करीब एक लाख लोगों की मौजूदगी थी।
गौरतलब है कि उस दिन इंग्लैंड में विश्व कप क्रिकेट चैंपियनशिप का फाइनल मैच वेस्ट इंडीज और भारत के बीच चल रहा था, इसलिए ज्यादातर लोग दूरदर्शन पर उसका सीधा प्रसारण देखने में व्यस्त थे। वह विश्व कप भारत ने कपिल देव की कप्तानी में जीता था। अगर उस दिन वह मैच नहीं होता तो कहीं ज्यादा लोग चंद्रशेखर के स्वागत में उपस्थित होते। पदयात्रा का समापन होने के बाद सभी पदयात्री विश्राम की मुद्रा में थे। मैं आईआईपीए के होस्टल में ठहरा था।
अगले दिन सभी स्थायी पदयात्रियों को दिल्ली और आसपास के पर्यटन स्थल घूमने का मौका मिला। बुलंदशहर में माधवजी ने विदाई भोज दिया। सभी पदयात्रियों को एक एक तश्तरी भेंट में दी। एक हफ्ते के भीतर सभी पदयात्री अपने अपने घरों को रवाना हो गए। पदयात्रा के बाद मेरे दिमाग में भविष्य की तस्वीर साफ हो गई। लेखक और पत्रकार बनना है, यह बात दिमाग में जम गई।
इंदौर लौटने के बाद मैंने खजूरी बाजार में पाठ्य पुस्तकें छापने वाले संघवी प्रकाशन में प्रूफ रीडिंग शुरू कर दी। वहां विभिन्न विषयों की प्रश्नोत्तर की सीरीज छपती थी। साल गुजरते गुजरते मैंने दैनिक भास्कर, इंदौर में प्रूफ रीडर के रूप में काम शुरू कर दिया। यतीन्द्र भटनागर संपादक थे। मुझे पहली बार अखबार के संपादकीय कार्यालय में काम करने का मौका मिला। प्रूफ रीडिंग करने के साथ ही मैं डेस्क पर भी बैठने लगा। डेस्क के प्रभारी रोमेश जोशी थे, जो प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी के भाई थे। उन्होंने अखबार के कई गुर बताए। इंट्रो लिखना सिखाया। खबरों के शीर्षक लगाना सिखाया।
दैनिक भास्कर में काम शुरू करते समय मेरा वेतन तीन सौ रुपए तय हुआ था और कहा गया था कि काम ठीक रहा तो तीन महीने बाद वेतन बढ़ा देंगे। उस समय मनमोहन अग्रवाल इंदौर संस्करण संभाल रहे थे। सुधीर अग्रवाल और उनके भाई किशोरावस्था में थे। मुझे वहां काम करना अच्छा लग रहा था। मेरे लेख भी छपने लगे थे। शाम को चार बजे से रात 12 बजे तक की ड्यूटी थी। इस बीच चंद्रशेखर भोपाल आए तो मैं और अनिल जैन उनसे मिलने भोपाल पहुंचे। पदयात्रा के आठ महीनों के बाद उनसे मुलाकात हो रही थी। कुशल क्षेम के बाद उन्होंने बताया कि भारत यात्रा केंद्र बना रहे हैं और पूछा, दिल्ली आओगे न? उनका पूछने का तरीका दिमाग में जम गया।
मैंने दैनिक भास्कर में तीन महीने पूरे होने के बाद मनमोहन अग्रवाल से पूछा कि आपने तीन महीने बाद वेतन बढ़ाने के लिए कहा था, क्या आप वेतन बढ़ा रहे हैं? उन्होंने अपनी ठसक के साथ कहा कि अभी इतने में ही काम करना पड़ेगा। मैंने कहा, तो फिर मैं कल से काम पर नहीं आ रहा हूं। यह कहकर मैं कार्यालय से निकला और दिल्ली का टिकट कटा लिया। 2 अप्रैल 1984 को मैं दिल्ली में था। पहाड़गंज से बस में बैठकर तीन मूर्ति मार्ग पहुंचा और चंद्रशेखर के घर 3, साऊथ एवेन्यू लेन पहुंच गया। उनके सचिव चतुर्भुज गौतम ने भोजन आदि करवाकर गेस्ट रूम में ठहरा दिया। करीब चार बजे मुझे सामान के साथ गेस्ट रूम से बाहर आने को कहा गया।
एक काली एंबेस्डर कार में आगे चालक लालसिंह की बगल में चंद्रशेखर बैठे, पीछे की सीट पर मैं और एक अन्य युवक मधुरेश बैठे। कार वहां से करीब चालीस किलोमीटर दूर भोंडसी पहुंची। वह हरियाणा के गुड़गांव जिले में भोंडसी और अकलीमपुर गांवों के बीच एक बीहड़ जैसा निर्जन स्थान था। एक ओटला था और मंदिर जैसा एक कमरा बना हुआ था। उसके सामने एक कुआं था। कुएं के पास दो तंबू लगे थे। एक तंबू में खाना बनाने की व्यवस्था थी। हम सब वहां ओटले पर बैठ गए। लोहे के एक पलंग पर चंद्रशेखर बैठे। नीचे बिछी दरियों पर हम लोग बैठे थे। मैं, मधुरेश और भोंडसी के कुछ लोग, जिनमें ओमपाल सिंह, महिपाल सिंह, कैप्टन आदि प्रमुख थे। चंद्रशेखर ने कहा, यहां अपने को भारत यात्रा केंद्र बनाना है। वह छत्तीस एकड़ जमीन चंद्रशेखर ने भोंडसी ग्राम पंचायत से ली थी। वे उस राशि से भारत यात्रा केंद्र बनाने वाले थे, जो उन्हें पदयात्रा के दौरान चंदे में मिली थी। चंद्रशेखर के बड़े भाई, जिन्हें सब स्वामीजी कहते थे, वहां रहने लगे थे। मैं शाम के समय अरावली पर्वत श्रंखला के बीच घिरे उस स्थान पर बैठा हैरान हो रहा था कि यहां भारत यात्रा केंद्र कैसे बनेगा? और मेरी भूमिका क्या होगी? यहां से एक बार फिर मेरी नई दिनचर्या शुरू होने वाली थी।


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