चित्तौड़गढ़ से गोपाल चतुर्वेदी की रिपोर्ट

प्राचीन काल से रक्षाबंधन के पर्व को भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक माना जाता है वही चितौड़गढ़ मुख्यालय के समीपवर्ती गांव ओछडी में करीब 155 वर्षों से एक अनूठी परम्परा चली आ रही है जिसमे गांव के सभी समाज के पुरुष भेदभाव को पीछे छोड़कर एक ही जाजम पर बैठ कर एक दूसरे को रक्षा सूत्र बांधने के साथ ही एक दूसरे की रक्षा करने का संकल्प भी लेते हैं।चित्तौड़गढ़ मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ओछडी गांव मे रक्षाबंधन के पर्व पर एकता और भाईचारे की एक मिसाल देखने को मिलती है,  जिसमें विगत 155 वर्षों से एक ही जाजम पर बैठकर गांव के समस्त समाज के लोग एक दूसरे को राखी बांधकर एक दूसरे की रक्षा करने का वचन भी देते हैं,वहीं इसकी जानकारी देते हुए गांव के पूर्व सरपंच दिग्विजय सिंह ने बताया कि ओछडी  गांव में यह अनूठी परंपरा हमारे पूर्वजों के समय से करीब 155 वर्षों से अनवरत चली आ रही है जिसमें बिना किसी भेदभाव के सभी समाज के लोग रावले में एक जाजम पर एकत्रित होकर एक दूसरे को रक्षा सूत्र बांधते हैं


सबसे बड़ी बात यह है कि एक दूसरे की रक्षा करने का संकल्प भी एक जाजम पर लिया जाता है,उन्होंने बताया कि इसके अलावा पूरे वर्ष में गांव के जिस किसी भी परिवार में मौत हुई है उसको भी शोक की राखी बांधी जाती है,और इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि कोई भी गरीब तबके के परिवार को कोई समस्या है तो उसका समाधान भी इस जाजम पर बैठकर सर्वसम्मति से किया जाता है,वही इस बारे में जानकारी देते हुए ग्रामीण शांतिलाल मेनारिया ने बताया कि वर्षों पुरानी चली आ रही इस परंपरा से जहां आपसी सदभाव और भाईचारे की मिसाल देखने को मिलती है, वही रक्षाबंधन के दिन पूरे गांव के वरिष्ठ और युवा भी इस अनूठे कार्यक्रम में एकत्रित होते हैं, युवाओं को इस कार्यक्रम में बुलाने का  मकसद यही है कि प्राचीन वर्षों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा को आगे भी आने वाले वर्षों में जीवंत रखा जाए।गौरतलब है की रक्षाबंधन कार्यक्रम से पहले गांव के सभी लोग पूर्व सरपंच दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में गांव के चारभुजाजी मंदिर सहित कई अन्य मंदिरों में जाकर भगवान को रक्षा सूत्र बांधकर उनसे हर तरफ खुशहाली की कामना करते हैं, इसके पश्चात गांव के मंदिरों का भंडारा भी खोला जाता है और इसके पश्चात रक्षा सूत्र बांधने का कार्यक्रम रावला में किया जाता है।