ब्यूरो रिपोर्ट।

यूं तो कोरोना महामारी ने आर्थिक विकास के हर क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया है। नौकरी हो या व्यापार कोई भी क्षेत्र इस महामारी की मार से अछूता नहीं रहा। लेकिन यदि हम बात करें सर्विस सेक्टर की तो निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को कोरोना से बहुत गहरी चोट पहुंचाई है। कई छोटे स्कूल बंद हो गए कई स्कूलों में वेतन नहीं मिला तो कई स्कूलों ने वेतन में खासी कटौती कर दी। देश के 20 राज्यों में सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन की ओर से कराई गई एक रिसर्च में सामने आया है कि लॉकडाउन के दौरान निजी स्कूलों के करीब 55% शिक्षकों के वेतन में कटौती हुई। कम फीस लेने वाले स्कूलों ने 63% और ज्यादा फीस लेने वाले स्कूलों ने लगभग 37% शिक्षकों का वेतन रोक रखा है। इन स्कूलों में पढ़ाने वाले लाखों शिक्षकों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। करीब 54% शिक्षकों के पास मासिक आय का दूसरा कोई जरिया नहीं है। 30% शिक्षक ही इस दौरान ट्यूशन पढ़ा पा रहे हैं। रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 70% अभिभावकों ने कहा है कि स्कूलों ने महामारी के बाद भी फीस में कोई कमी नहीं की। वे अभी भी पहले जैसे ही फीस वसूली कर रहे हैं। वही निजी स्कूलों का ये कहना था कि लगभग 50% अभिभावकों ने ही स्कूलों में फीस जमा कराई हैं, जिससे स्कूलों की कमाई घट गई है और इसका सीधा प्रभाव शिक्षकों के वेतन पर पड़ा है। आपको बता दें कि कोरोना काल के दौरान प्रदेश में भी हजारों निजी स्कूल ऐसे रहे जिन्होंने स्कूल बंद होते ही शिक्षकों का वेतन भी बंद कर दिया। इसके चलते हजारों शिक्षकों को किराए का मकान खाली करके परिवार सहित अपने अपने गांव की ओर प्रस्थान करना पड़ा।