मंदिर छोड़ने की तैयारी

ऋषिकेश राजोरिया 

बांद्रा पश्चिम में राम मंदिर, जैसा मैंने समझा, साधुओं का बहुत पुराना स्थान था। सैकड़ों साल पुराना। पहले यहां तयशुदा जंगल था। थोड़ी दूर समुद्र का पथरीला किनारा है, जिसे लोग अब बैंड स्टैंड के नाम से जानते हैं। देश में जो भी साधु हैं, उनका एक सिस्टम है। कोई न कोई अखाड़ा इनका मुख्यालय होता है, जहां इनका रजिस्ट्रेशन होता है। नागा साधुओं का मुख्यालय हनुमान गढ़ी, अयोध्या है। साधु तरह-तरह के होते हैं। किसी के नाम के साथ दास लगता है तो किसी के नाम के साथ आनंद लगता है, किसी के नाम के साथ गिरी लगता है। इन लोगों को अनुशासनबद्ध जीवन व्यतीत करना होता है। मंदिर में ज्यादातर त्यागी और नागा साधु ही आते थे।

जिस राम मंदिर में मैं रहता था, उसके महंत लक्ष्मणदासजी महाराज थे, जो त्यागी साधु थे। त्यागी साधुओं को 12 वर्ष वनवास में रहना पड़ता है। उसके बाद वे सिले हुए कपड़े नहीं पहनते हैं। ये वैष्णव होते हैं और श्रीराम के भक्त होते हैं। देश भर में इन साधुओं के स्थान हैं, जहां हनुमानजी के मंदिर प्रमुख रूप से हैं। मंदिर का महंत सीनियर साधु होता है। महंत को मंदिर का कामकाज संभालने के लिए साधुओं के अलावा अन्य योग्य व्यक्तियों को नियुक्त करने की स्वतंत्रता रहती है।

लक्ष्मणदासजी की उम्र साठ वर्ष के पार थी। वे बांद्रा राम मंदिर के महंत थे। दुबले पतले और हमेशा चुस्ती फुर्ती से रहते थे। मैंने महात्मा गांधी को नहीं देखा। वे महंतजी जैसे ही दिखते होंगे। इनकी दाढ़ी थी, वे दाढ़ी साफ रखते थे। मंदिर की गौशाला गुलाब सिंह नामक व्यक्ति संभालता था। वह गौशाला के बगल में एक झोंपड़ी में परिवार सहित रहता था। सुंदर पत्नी और दो बच्चों के साथ। उसके बच्चे मंदिर में खूब उछल कूद करते थे। गुलाब सिंह का एक रिश्तेदार रोहिणी भी उप्र के किसी गांव से आ गया था। वह रोजाना सुबह राजेश खन्ना के यहां पूजा करने जाता था। गुलाब सिंह रात में एल्को मार्केट में वाचमैन के रूप में काम करता था। हिल रोड पर बना वह मार्केट लीना चंदावरकर का बताया जाता था और शापिंग माल की तर्ज पर बना था।

मेरे लिए रोजाना सुबह चार बजे से दोपहर 2 बजे तक की व्यस्तता के बाद आराम जरूरी था। चार बजे तक आराम करने के बाद फिर चाय बनानी पड़ती। शाम को भोजन नहीं बनता था। दोपहर के बचे हुए भोजन से काम चलता था। पांच छह बजे थोड़ा अवकाश मिलता तो घूमने निकल जाता। अक्सर हिल रोड पार करते हुए  बैंड स्टैंड पहुंच जाता। रास्ते में मोड़ पर गैलेक्सी नामक इमारत है, जहां सलीम खान, सलमान खान, अरबाज खान, सोहैल खान रहते हैं। बैंड स्टैंड के सामने एक इमारत में रेखा का फ्लैट है। और भी कई फिल्मों से जुड़े लोग वहां रहते हैं। पास ही सी रॉक होटल है। कभी कभी कार्टर रोड की तरफ निकल जाता था, जिसके एक तरफ समुद्र और दूसरी तरफ तमाम बंगले थे। ऋषिकेश मुखर्जी, नौशाद, सुनील दत्त, राजेश खन्ना के बंगले उसी सड़क पर थे।

राजेश खन्ना के बंगले आशीर्वाद के बाहर फुटपाथ पर लगी बैंच पर मैंने कई शामें अकेले बैठकर समुद्र की तरफ देखते हुए गुजारीं। कभी कभी एसएन त्रिपाठी से मिलने चला जाता। लक्ष्मीनारायण गर्ग से दुबारा मिलने की इच्छा फिर नहीं हुई। प्यारेलालजी बहुत व्यस्त हो गए थे, इसलिए उनसे मिलना भी नहीं हो पाया। मंदिर में हारमोनियम था। उसको बजाना सीखने लगा। नेशनल लाइब्रेरी का सदस्य था ही, उपन्यास लाकर पढ़ने का क्रम जारी था। कुछ माह जिंदगी ऐसे ही कटी। अप्रैल 1983 में चैत्र नवरात्र आए। मैंने पूरे नौ दिन उपवास किया। मंदिर में अखंड रामायण बैठाई गई। मैंने उत्साहपूर्वक रामायण बांची। मंदिर में फलों की कोई कमी नहीं थी, इसलिए उपवास में कष्ट नहीं हुआ।

1983 में राम नवमी 20 अप्रैल को थी। दोपहर को धूमधाम से राम जन्मोत्सव मनाया गया, अखंड रामायण का समापन हुआ। पूर्णाहूति हुई। इससे थोड़ा अवकाश मिला तो मंदिर के बाहर देखा। सामने एसवी रोड (स्वामी विवेकानंद रोड) पर काफी चहल पहल था। मैं मंदिर से बाहर निकलकर पेट्रोल पंप के पास पहुंच गया। देखने लगा। एक जुलूस सामने से निकल गया। वह चंद्रशेखर की पदयात्रा थी, जो कन्याकुमारी से दिल्ली के लिए पदयात्रा पर निकले हुए थे और उस समय बंबई में एसवी रोड से गुजर रहे थे। उनके साथ एक हजार से ज्यादा लोग होंगे।

जुलूस निकल जाने के बाद मैंने मंदिर में लौटकर भोजन किया, आराम किया और चार-पांच बजे नवभारत टाइम्स पढ़ने लगा। उसमें चंद्रशेखर की पदयात्रा पर एक लेख छपा था, जिसका सार यह था कि जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कन्याकुमारी से दिल्ली तक पदयात्रा कर रहे हैं। यात्रा में बड़ी संख्या में लोग जुड़ रहे हैं। बेंगलौर में उनकी पदयात्रा में दिलीप कुमार और सायरा बानू भी शामिल हुए। पुणे में शत्रुघ्न सिन्हा उनसे मिलने पहुंचे। आज शाम को घाटकोपर में सभा होने वाली है, जिसमें देवानंद और बंबई के मेयर मनमोहन सिंह बेदी भी शामिल होंगे। वह जुलूस और नवभारत टाइम्स में छपा वह लेख मेरे दिमाग पर गहरी छाप छोड़ गया।

मैं सोचने लगा कि चंद्रशेखर की पदयात्रा में शामिल होना चाहिए। यह नया और अद्भुत अनुभव होगा। इस पर मैंने तीन दिन तक विचार किया और आखिरकार महंतजी को बता दिया कि मैं मंदिर छोड़कर चंद्रशेखर की पदयात्रा में शामिल होने जा रहा हूं। उन्होंने मुझे हैरानी से देखा। कहा, पागल हो गया है क्या? जरा सा जुलूस देख लिया और बावला हो गया। कहीं जाने की जरूरत नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना। मैंने काफी सोच समझकर फैसला किया था। 23 अप्रैल को मैं संदूक उठाकर मंदिर से रवाना हो गया। अब मुझे चंद्रशेखर की पदयात्रा में शामिल होना था।

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)