तुम
ब्राह्मण को बिरहमन
समुद्र को समुन्दर
ख़ामोशी को ख़ामशी,ख़मोशी
भँवरे को भौंरा
भ्रम को भरम
धर्म को धरम
मर्ज़ को मरज़
भाग्य को भाग
खण्डहर को खँडर
और भी जाने
किस-किस को क्या-क्या
करो
तो
कोई बात नहीं
लेकिन
हम नागरी में लिखने वाले
अगर
शह्र को शहर
लहर् को लहर
ज़ह्र को ज़हर
विदाअ को विदा
शम्अ को शमा
अम्न को अमन
शुक्रिय: को शुक्रिया
सहीह को सही
तक़तीअ को तक़ती
ज़बान को ज़ुबान
वबाल को बवाल
मआनी को मानी
नद्दी को नदी
ज़ियादा को ज़्यादा
अस्ल को असल
फ़स्ल को फ़सल
जैसा
कुछ भी लिख दें
तो
सम्प्रेषण का कोई भी दोष
न होते हुए भी
नहीं होता तुम्हें स्वीकार
फ़ौरन चढ़ाने लगते हो
नाक-भौं
बताने लगते हो हमें
वो जाहिल
जिसने मानो कर लिया है
किसी भाषाई अतिक्रमण का
घनघोर पाप
और हाँ
जब नहीं सूझता तुमको
कोई मुनासिब शब्द
उर्दू का
तो करने लगते हो प्रयोग
अंग्रेज़ी के अल्फ़ाज़ का
अध्यक्ष नहीं बोलते
सद्र को
प्रेसिडेंट बोलते हो
लोकतन्त्र नहीं बोलते
जम्हूरियत को
डेमोक्रेसी बोलते हो
जनगणना नहीं बोलते
मर्दुमशुमारी को
सेन्सस बोलते हो
धर्मनिरपेक्षता
जैसे
शब्दों को बोलने का तो
प्रताप
ही नहीं जुटा पाते तुम
क्योंकि
तुम्हारी लुग़त में
न तो क्ष है और
न ही प्र
तुम्हारा यह
परताप
और तुम्हारी यह
धरमनिर्पेच्छता
तुम्हीं को मुबारक हो
नस्तालीक़ वालों ,
तुम्हारी तो उर्दू
हिन्दुस्तान की नहीं
जबकि तुम भी जानते हो
और हम भी
कि उर्दू तो
हिन्दुस्तान की ही है !
लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'


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