चंद्रशेखर की पदयात्रा

                                                                    ऋषिकेश राजोरिया 


बांद्रा राम मंदिर में दूसरी बार करीब पांच छह माह निवास रहा। मंदिर से उच्चाटन क्यों हुआ, इसके कई कारण रहे। पहला कारण यह रहा कि मंदिर भगवान का होता है। लोग वहां भगवान से प्रार्थना करने जाते हैं। जो लोग घरों में सांसारिक जीवन में रहते हैं, उनके लिए मंदिर एक बाहर की जगह होती है, जहां वे एक प्रतिमा के दर्शन करते हुए कल्पना करते हैं कि वे भगवान के दर्शन कर रहे हैं। वे मन ही मन तमाम तरह की कामनाएं करते हैं। तो मंदिर एक व्यवस्था बन गया है, जो साधु संत कहलाने वाले लोग चलाते हैं। इसे दुकान नहीं कह सकते, लेकिन यह दुकान की तरह ही है। यहां आस्था का कारोबार होता है।

सारे साधु संत संसार को छोड़े हुए होते हैं। लेकिन धार्मिक जगत में उनका एक नया संसार बन जाता है। देह के विकार सभी को व्यापते हैं। काम वासना से मुक्त कोई नहीं रह सकता। वह मनुष्य का मूल स्वभाव है। मैंने ऐसे साधुओं को भी देखा, जो कहीं किसी स्थान पर महंत बने हुए थे। उनके पास अच्छा पैसा होता था। वे सिर्फ काम वासना पूरी करने के लिए बंबई की यात्रा करते थे। एक अभिराम दास था। वह महंत का बहुत चहेता था, क्योंकि वह महंत की तबीयत से मालिश करता था। वह मंदिर से साधु वेश में निकलता। एक पान की दुकान पर उसने पैंट शर्ट रखे हुए थे। वहां वह कपड़े बदलकर पता नहीं कहां कहां घूम आता और पान की दुकान से वापस साधु बनकर मंदिर में लौट आता था। उसका एक महिला से इश्क भी चल रहा था। एक बार शिवसैनिकों ने उसको रंगेहाथ पकड़कर पिटाई भी की थी।

उस मंदिर में मैंने आध्यात्मिकता जैसी कोई बात नहीं देखी, सिवाय इसके कि महंत लक्ष्मणदासजी उस मंदिर को साधुओं के स्थान के रूप में संभाल रहे थे। रोजाना मंदिर की सारी गतिविधियां समयानुसार नियमबद्ध तरीके से पूरी होती थी। सुबह शाम नियम से भगवान की आरती हो जाती थी। पंचांग का पालन होता था। दूसरी तरफ उस मंदिर की जगह पर एक ट्रस्ट की नजर थी और ट्रस्ट के लोग तय कर चुके थे कि उन्हें वह मंदिर हड़पना है। वे लक्ष्मणदासजी के मरने की राह देख रहे थे।

मेरे लिए उस मंदिर में कोई कमी नहीं थी। शुद्ध घी का बना सात्विक भोजन मिलता था। दूध घी की कमी नहीं थी। पैसे की भी कमी नहीं थी। मंदिर में जमकर चढ़ोतरी आती थी। ट्रस्ट ने मंदिर में दान पेटियां लगवा दी थीं और निर्देश लिखवा दिए थे कि लोग दान पेटी में ही पैसे डालें, लेकिन पेटियों से बाहर भी लोग काफी पैसे प्रतिमाओं पर चढ़ाते थे, और वह राशि मंदिर की गतिविधियां सुचारु रूप से चलाने के लिए पर्याप्त होती थी। महंत ध्यान रखते थे कि कोई साधु प्रतिमाओं पर चढ़े पैसे न चुरा ले। इस माहौल में रहना मुझे बहुत अटपटा लगता था। अगर मैं विधिवत साधु बन जाता तो बात अलग थी। बाद में मैं भी कहीं न कहीं महंत बन जाता। लेकिन मैंने साधुओं का जो आचरण नजदीक से देखा, वह निराशाजनक था। उनके बीच रहना मेरे जीवन का एक पड़ाव अवश्य था, लेकिन पूरा जीवन नहीं। इसलिए मैं संदूक उठाकर मंदिर से बाहर निकला और बस मैं बैठकर चेंबूर पहुंच गया।

मुझे बंबई आगरा रोड पकड़ना था। चंद्रशेखर इसी रास्ते पैदल दिल्ली पहुंचने का कार्यक्रम बनाए हुए थे। मैंने तीन दिन पहले उन्हें बांद्रा में राम मंदिर के सामने देखा था। अखबार में पढ़ा था। सिर्फ और सिर्फ इसी आधार पर मैंने पदयात्रा में शामिल होने का इरादा कर लिया था। उस समय राजनीति के बारे में मेरी समझ यह थी कि इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगाया तो देश में बड़ा विरोध हुआ था। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बन गई थी, मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे और चंद्रशेखर जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। दो ढाई साल बाद जनता पार्टी की सरकार गिर गई। उसके बाद मध्यावधि चुनाव की परिस्थितियां बन गई। चुनाव के बाद इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं। जिन पार्टियों ने एक होकर जनता पार्टी बनाई थी, वे सब अलग अलग हो गईं। उस जनता पार्टी के बचे हुए हिस्से के अध्यक्ष चंद्रशेखर थे। पदयात्रा उनकी नई राजनीति थी।


चेंबूर में हाईवे पर पहुंचकर मैंने एक ट्रक चालक से लिफ्ट मांगी। कहा कि रास्ते में जहां जुलूस जैसा दिखे, वहां उतार देना। नासिक के पास उमराणा में ऐसा माहौल दिखा। देश का नेता कैसा हो, चंद्रशेखर जैसा हो। जिंदाबाद जिंदाबाद, जनता पार्टी जिंदाबाद। इस तरह के नारे लग रहे थे। काफी ढोल ढमाका था। वहां मैं ट्रक से उतर गया। शाम के करीब आठ बजे थे। एक बड़ी धर्मशाला जैसी इमारत में पदयात्रियों के ठहरने की व्यवस्था थी। मैं भी उन पदयात्रियों के बीच शामिल हो गया, जहां मेरा परिचित कोई नहीं था। जिस तरह बारात की व्यवस्था होती है, वैसी ही व्यवस्था थी। इमारत की छत पर पदयात्रियों के सोने के लिए कई गद्दे लगाए गए थे। एक गद्दे पर मैंने भी अपना संदूक रख दिया। फिर नीचे पहुंचकर देखा। एक कमरे में चंद्रशेखर लेटे हुए थे। एक युवक कटोरी से उनके पैर सेंक रहा था। चंद्रशेखर चप्पल पहनते थे। पदयात्रियों के बीच बैठकर मैंने भोजन किया। और जैसे सारे पदयात्री सो रहे थे, वैसे ही मैं भी सो गया। यह राजनीतिक माहौल में सांस लेने का मेरा पहला मौका था। मैं बंबई से नासिक तक पहुंचने में काफी थक गया था। मंदिर के माहौल से अचानक बाहर निकला था। देखते हैं, कल क्या होता है, यह सोचते हुए सो गया।

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)