पेट्रोल पंप पर काम, फिर वापस बंबई  




ऋषिकेश राजोरिया 

हाथरस से मथुरा, वहां से रतलाम और फिर इंदौर। हाथरस में कुछ महीनों के प्रवास का लाभ यह हुआ कि काका हाथरसी के साथ रहने का मौका मिला। पत्रिकाएं, किताबें कैसे छपती हैं? सामग्री कैसे तैयार होती है? संपादन क्या होता है? प्रूफ रीडिंग कैसे होती है? साहित्य का क्या मतलब है? कहानी क्या होती है? विवरण क्या होता है? निबंध क्या होता है? कविता क्या होती है? लिखने वाली कविताएं, मंच पर बोली जाने वाली कविताएं, फिल्मों नाटकों में जरूरत के मुताबिक लिखी जाने वाली कविताएं, तुकांत कविताएं, अतुकांत कविताएं, इनमें क्या अंतर होता है? छंद जैसे दोहा, सोरठा, चौपाई, कवित्त आदि क्या हैं? दिमाग में बहुत कुछ भरकर मैं हाथरस से लौटा, लेकिन इंदौर में उसका फिलहाल उपयोग नहीं था।


पिताजी शिक्षक थे और महू के पास गांव भगोरा में पदस्थ थे। छोटे भाई बहन पढ़ रहे थे। मुझे अपना खर्च चलाने के लिए कमाई का कोई जरिया खोजना जरूरी था। नईदुनिया के दूसरे पेज पर छपे एक विज्ञापन पर नजर अटकी। एक कंपनी को पढ़े लिखे युवक की जरूरत थी। मैं दिए गए पते पर पहुंच गया। दो युवकों ने मुझसे बातचीत की, परिचय लिया और कार में बैठाकर मधुमिलन टाकीज के पास एक पेट्रोल पंप पर ले गए। मुझे उसी पेट्रोल पंप पर काम करना था। गाडि़यों में पेट्रोल भरना, पर्चियां काटना, हिसाब मिलाना आदि।


पेट्रोल पंप पर सर्विस सेंटर भी था, जहां गाडि़यां धुलती थीं। करीब 15 कर्मचारी काम करते थे। दिन भर बहुत गालियां बकते थे। साथ ही दिन भर पेट्रोल, ऑइल, ग्रीस आदि की गंध दिमाग में भरी रहती थी। तीन सौ रुपए वेतन पर मैंने वहां दो महीने काम किया। इसके बाद मन नहीं लगा तो वापस बंबई पहुंच गया। बांद्रा में राम मंदिर। महंत लक्ष्मणदासजी महाराज मुझे देखकर बहुत खुश हुए, कहा, अच्छा हुआ, लौट आया। अब कहीं मत जाना। उन्होंने मुझे भंडार की जिम्मेदारी सौंप दी। भंडार मतलब मंदिर का रसोईघर।


पहले जहां मैं बैठता था, हनुमानजी की मूर्ति के सामने शनिवार और मंगलवार को चढ़ोतरी इकट्ठा करने के लिए, वहां अब एक साधु रामकिशोर दास बैठने लगा था। मंदिर में मेरी नई दिनचर्या शुरू हुई। रोजाना सुबह चार बजे उठना। महंतजी को स्नान कराना, फिर खुद स्नान करना। स्टोव जलाकर पांच लीटर से ज्यादा दूध गरम करने के लिए रखना। फिर चाय बनाना। महंतजी और मेरे लिए शुद्ध दूध की चाय। मंदिर में रहने वाले बाकी लोगों के लिए दूध में पानी मिलाकर बनाई हुई चाय। चीनी मिट्टी के बर्तनों का उपयोग नहीं होता था। सब स्टील की कटोरी, गिलास या फूलपात्र में चाय पीते थे।


मंदिर में हर समय 15 से 20 लोग बने रहते थे। सात आठ लोग स्थायी रूप से रहते थे। बाकी साधु होते थे, जो आते जाते रहते थे। चाय बनाने के बाद कुछ देर अखबार पढ़ता। मंदिर में एकमात्र हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स आता था। अखबार पढ़ने के बाद भोजन की तैयारी। दो बड़ी सिगडियों में कोयले भरता, उनके निचले हिस्से में नारियल की नट्टी में राख भरकर मिट्टी के तेल से उसे भिगोता और माचिस से सुलगा देता। उसकी लपटों से ऊपरी हिस्से में रखे कोयले सुलगने लगते। सिगडि़यां सुलगने के बाद एक पर दाल और एक पर चावल का तपेला पकने के लिए रख देता। उसके बाद आटा गूंथता। करीब पांच किलो आटा गूंथना पड़ता। इस दौरान कुछ लोग सब्जी काटते। आम तौर पर परवल औ्रर आलू की सब्जी होती थी। आंटा गूंथने के बाद फिर स्टोव पर चाय बन जाती। तब तक दाल चावल पक जाते। उनको उतारकर फिर सिगड़ी में कोयले भरता। कढ़छी को अंगारों के बीच गरम करके उसमें घी और हींग जीरा आदि रखकर दाल में बघार लगा देता। एक बड़ी कढ़ाही में सब्जी छोंकता।


मंदिर में प्याज और लहसुन का उपयोग नहीं होता था। लाल मिर्च का भी उपयोग नहीं होता था। हरी मिर्च वापरी जाती थी। सब्जी बनने के बाद रोटी सेकता। सहयोग देने के लिए एक साधु आ जाता। दोपहर बारह-एक बजे तक भोजन तैयार हो जाता। तीन थाल लगते। एक राम-सीता-लक्ष्मण के लिए, एक लक्ष्मीनारायण के लिए, एक राधा- कृष्ण के लिए। भंडार के कमरे से मंदिर तक के रास्ते पर पानी छिड़कने के बाद तीन लोग भोग के थाल मंदिर में ले जाते। एक प्रमुख पुजारी ध्रुव शरण दास, दूसरा मैं, तीसरा मेरा सहयोग करने वाला साधु। हनुमानजी का भोग एक अलग तश्तरी में रखा जाता था। भगवान को भोग लगने के बाद एक थाल महंत के सामने, दूसरा पुजारी ध्रुव शरण के सामने और तीसरा मेरे सामने होता। मंदिर के बाकी लोग पंगत में भोजन करते। यह सिलसिला रोजाना सुबह चार बजे से दोपहर एक-दो बजे तक चलता था। मैं कर्णवास में काका के लिए चार रोटियां ठीक से नहीं सेक पाया था, जबकि यहां मैं 15-20 लोगों के लिए भोजन तैयार करने लगा था।