ब्यूरो रिपोर्ट।
बुधवार को दो मंत्रियों के बीच हुई तीखी तकरार हर ख़ास ओ आम के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। विपक्ष का कोई भी मुखर नेता इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता सो सतीश पूनिया, राजेंद्र राठौड़ और गुलाब चाँद कटारिया, सभी ने अपने-अपने तरकश से तीर छोड़े। सत्ता पक्षघ की ओर से परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने ठंडे छींटें देने की कोशिश की लेकिन शाम होते होते यह स्पष्ट हो गया कि झगड़ा मामूली नहीं था और ना ही धारीवाल ने आदतन तैश में आकर अपना आपा खोया था।
कल हुई कहा-सुनी में डोटासरा ने एक मुद्दा धारीवाल के जयपुर का प्रभारी मंत्री होने के बावजूद जयपुर में बैठक ना करने का उठाया था। गुरूवार शाम को धारीवाल ने एक बार फिर कोटा से ही वीसी के जरिये जयपुर की बैठक का अपना इरादा स्पष्ट कर दिया।
झगड़ा अगर प्रदेश के नंबर दो मंत्री धारीवाल और शिक्षा मंत्री के बीच हुआ होता तो फिर भी मामला चल जाता लेकिन तकरार तो कैबिनेट के नंबर दो और प्रदेशाध्यक्ष के बीच हुई थी और यही बात शायद धारीवाल भूल गए। जिस तरीके से गोविन्द सिंह डोटासरा ने पार्टी की आंतरिक कलह के बीच प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाल कर मुख्यमंत्री के साथ जिम्मेदारी बांटी वो किसी से छुपा नहीं है। अब धारीवाल इस बात को कांग्रेस की राज्य सरकार का अलिखित संविधान मानते हैं कि अगर सीएम के बाद अगर कोई है तो बस वे हैं। ऐसा डॉ. सीपी जोशी के विधानसभा स्पीकर बनने के बाद कुछ ज्यादा दृष्टिगोचर हुआ है। धारीवाल की पिछली पारी में उनके नजदीक दिखने वाले उनके कई पुराने वफादार इस बार कहीं नजर नहीं आ रहे। सूत्र बताते हियँ कि धारीवाल ने उनसे बिलकुल मुंह मोड़ लिया है और अब वे राजधानी जयपुर और कोटा के अलावा प्रदेश के अन्य हिस्सों के धनाढ्य तथा प्रभावशाली लोगों को ही अपने नजदीक आने दे रहे हैं।
एक उड़ती चिड़िया, जो कांग्रेस में सिर्फ ट्विटर पर राजनीति के लिए जानी जाती है, ने बताया कि धारीवाल जी साड़ी मोर्चाबंदी उस वक़्त के लिए है जब, किसी भी कारण से, गहलोत को सीएम पद छोड़कर दिल्ली भेजा जायेगा और जयपुर में एक सर्वमान्य नेता की खोज होगी। अब निश्चित ही पायलट खेमे को डोटासरा का कोई भी नजदीकी तो कतई मंजूर नहीं होगा फिर डॉ जोशी का आशीर्वाद धारीवाल अपने ऊपर मान कर चलते ही हैं। यानि धारीवाल की गणित अगर बिगड़ेगी तो इस बात पर कि राहुल गाँधी के नजदीकी लोग, जैसे वेणुगोपाल, जातिगत आधार पर डोटासरा का नाम आगे कर दें। बने या ना बने लेकिन दावे दार भी अगर हो आगे तो बुज़ुर्गों का बाकि जीवन तो होम हो ही जायेगा।
अगर ऐसा कुछ नहीं होता तो भी इस सिलसिले में धारीवाल को अपना कुछ बिगड़ता नहीं दिखता। वैसे भी आखिरी पारी है, अगर कोई ढीली गेंद मिले तो आगे बढ़कर शॉट की कोशिश तो बनती ही है। राजनीति में भी टेस्ट, वन दे और 20-20 के बाद IPL, कोच और सलेक्टर जैसे अवसर होतें ही हैं।


2 टिप्पणियाँ
मर रहे हे , मल्हार गा रहे हे ।
जवाब देंहटाएंमर रहे हे , मल्हार गा रहे हे ।
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