पूछते हो तुम कि अब हम क्या हुए हैं
पेड़ से टूटा हुआ पत्ता हुए हैं
थे कभी हम भी घनी छाया का हिस्सा
शाख भी सरगोशियाँ करती थी हमसे
पेड़ की आभा हमीं से थी चमन में
इक हरी सी गन्ध भी झरती थी हमसे
थे कभी वेतन के बढ़ते मानकों सा
अब मगर घटता हुआ भत्ता हुए हैं
लोग हमको तोड़ते थे पोंछते थे
और फिर हमसे बनाते पात्र कितने
पात्र भी ऐसे कि जिनमें अर्घ्य रख कर
सीखते अर्चन गुरू से छात्र कितने
हर महकते फूल से तब मित्रता थी
और अब शूलों से अलबत्ता हुए हैं
वक़्त की बदली नज़र के साथ हम भी
पड़ गये पीले हुई ढीली पकड़ भी
शाख से रिश्ता भी अब तो याद में है
आत्मलज्जित है हमारी वह अकड़ भी
सूख कर ऐसे गिरे हैं इस धरा पर
आँधियों में उड़ रही सत्ता हुए हैं
लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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