कहीं भला सा जता रही है कहीं बुरा भी बता रही है

कहाँ कहाँ से मेरी कहानी मुझे ये दुनिया सुना रही है


अजीब शै है हमारी शोहरत अजीब है फ़लसफ़ा भी इसका

कभी जो कर ली थी इक कमाई उसी को अब तक भुना रही है


घड़ी कोई भी नहीं है चलती मगर घुमाती है ये समय को

युगों-युगों से यही घड़ी तो जहां में सबको चला रही है


अभी हमारे बदन ने अपनी अना को पूरा नहीं है खोया

अभी हमारी ही रूह हमको ज़रा सँभलना सिखा रही है


बनेगा कैसे ये मुल्क अपना कहाँ तिरंगा ही फिर रहेगा

यहाँ सियासत ही रंग कोई सभी के मन पर चढ़ा रही है


किसी को कोई भी दोष क्या दें करें किसी का गिला भी कैसे

हमें हमारी ही ज़िन्दगी तो हँसा-हँसा कर रुला रही है


फ़क़त ये 'साहिल' ही जानता है नदी के बहते सुराग सारे

कहाँ से नदिया ये आ रही है किधर को नदिया ये जा रही है


लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)