बादलों जैसा तेरा प्यार
कभी बरसता रिमझिम रिमझिम
कभी मूसलाधार
तपन धरा की जब जब बढ़ती
सघन मेघ तब घिर आते
लेकिन तेरा ठौर-ठिकाना
पता नहीं हम कर पाते
बादल तो आवारा होते
तू है दुनियादार
सागर से बादल का रिश्ता
चन्दा जाने या फिर हम
कभी ज्वार है कभी है भाटा
जान लिया तुझको हमदम
किन्तु अमावस्या को चन्दा
गया गगन के पार
तनिक बैठ सन्निकट हमारे
नेह-गेह की बातें कर
मन की खेती फिर सरसाये
ऐसी कुछ बरसातें कर
किन्तु अहम के घोड़े पर तू
हरदम रहे सवार
लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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