ग़लती को जिसने अपनी ग़लती कभी न माना

आसान तो नहीं है उसको सज़ा सुनाना


ये ही सिखा गये हैं मुझको तो मेरे बाबा

पत्थर हो सामने जब तू आइना दिखाना


जी तो रहे हैं हम भी साँसें ही ले रहे हैं

इस ज़िन्दगी का मक़सद अब तक न हमने जाना


किसकी करें शिकायत किसका गिला करें हम

आया नहीं हमी को रिश्ते यहाँ निभाना


तब-तब ही ज़िन्दगी पर इक बर्क़ सी गिरी है

जब-जब भी मन का मौसम होने लगा सुहाना


फ़िल्मों की बात है वो बस गीत का है मिसरा

कोई नहीं बिछाता पलकों का शामियाना


जिस पर झुकी थी मीरां मेरा भी सिर वही हैं

जो मीर का है यारो मेरा भी वो घराना


अब हो गयी नियन्त्रित गतिमान होते-होते

रास आ गया नदी को 'साहिल' का आज़माना



लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)