सरकार बनाम हिंदुत्व


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।

आज हिंदुत्व की क्या स्थिति है? जो भी हिंदू हैं, वे हिंदुत्व का पालन करते हैं। यह सनातन धर्म आत्मा और परमात्मा के संबंधों पर आधारित है, वेद निर्देशित है, जो आज कई समूहों में बंट चुका है, और हर समूह के लोग हिंदू हैं। इन सभी समूहों के कारोबार, जीवन-शैली, आजीविका आदि हिंदुत्व आधारित है। सभी अपने-अपने घरों में, कुटुंब में अपनी श्रद्धा से पूजा-आराधना करते हुए बाकी अन्य लोगों से साथ समभाव के साथ रहते हैं और एक-दूसरे के सुख-दुख में भागीदार बनते हैं। यह देश इसी तरह सदियों से चल रहा है। राजनीति अपनी जगह है, सामाजिक जीवन अपनी जगह।

सामाजिक जीवन को गतिशील बनाए रखने के लिए अर्थव्यवस्था का सुचारु बने रहना अत्यंत आवश्यक है, इस तथ्य को समझते हुए कभी भी किसी भी राजा ने या अंग्रेज सरकार ने अर्थव्यवस्था में या लोगों के धार्मिक मामलों में सीधे दखल देने का दुस्साहस नहीं किया। अंग्रेजों के शासन में एक बार वायसराय डलहौजी ने ऐसा दुस्साहस किया था, लेकिन इसका नतीजा यह निकला स्वतंत्रता आंदोलन की शुरूआत हो गई। इसके बाद ही अंग्रेजों ने हिंदू समाज में फूट डालना शुरू किया। 

शासन को टैक्स लगाने और गलत कारोबार को रोकने के अधिकार हैं, लेकिन इस देश में किसी को अपने दम पर जीविकोपार्जन के लिए काम-धंधा करने से किसी ने नहीं रोका। इसी वातावरण में हिंदुत्व फलाफूला है। इसमें राजनीति का स्थान नहीं है। हालांकि राजनीति हमेशा से रही है। सभी सरकारों ने जनता को अपने हिसाब से हांकने के प्रयास किए हैं। लेकिन निजी व्यापार लोगों ने अपने हिसाब से किया है। अंग्रेज सरकार ने लोगों को ज्यादा पैसे कमाने से रोकने के लिए कई नियम बनाए, जो देश आजाद होने के बाद खत्म होने चाहिए थे, लेकिन इसका उलटा हुआ। ऐसे-ऐसे नियम बन गए कि लोगों का सुविधाजनक तरीके से आमदनी बढ़ाना ही मुश्किल हो गया।

गांधी ने नमक पर टैक्स के खिलाफ अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से 78 लोगों के साथ गुजरात के समुद्रतटीय गांव दांडी तक पैदल यात्रा की थी और 12 मार्च 1930 को हाथ में नमक लेकर नमक विरोधी कानून भंग किया था। देश आजाद होने के बाद नमक पर कई गुना टैक्स बढ़ चुका है। लोगों को जबरन प्रोसेस्ड नमक खाने के लिए विवश करने की नीति अपनाई गई है। पिछले सत्तर सालों से इस देश की लोकतांत्रिक सरकारें जिस तरह चली हैं, उसमें हिंदुओं को क्या लाभ हुआ? अंग्रेजों की फूट डालो, राज करो की नीति हर पार्टी ने अपनाई। हिंदुओं में आपस में फूट, हिंदू-मुसलमान में फूट, प्राचीन ज्ञान का जबरन गुणगान करते हुए अपनी बड़ाई खुद करने की आदत, धर्म पर आधारित अंधविश्वास... यह सब भारतीय राजनीति में कूट-कूटकर भरा हुआ है।

यह सत्य है कि हिंदू आम तौर पर ईमानदार होते हैं, लेकिन व्यवस्था उन्हें भ्रष्ट बनने के लिेए विवश करती है। कोई भी सौ रुपए कमाएगा तो उसमें से कितने पैसे सरकार को दे सकता है? अगर लोगों के काम करने में, रोजगार चलाने में ही सरकारी अड़ंगेबाजी रहेगी तो देश का विकास कैसे हो सकता है? भारत का अब तक का इतिहास यही रहा है कि सरकार ने तो लोगों को हमेशा ही खूब परेशान किया, लेकिन फिर भी देश अगर विश्व शक्ति के रूप में खड़ा है, तो इसमें देशवासियों की मेहनत ही है। ये सभी वोट देने वाले हिंदू ही हैं। क्या इन लोगों का इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में करने से देश का विकास होगा? और क्या एक ही पार्टी का समर्थन करने वाले देशभक्त कहलाएंगे? यह बहुत बड़ी विडंबना है। जैसी देशभक्ति अमेरिका के लोगों में है, वैसी भारत में बिलकुल नहीं है और इसके लिए राजनीतिक पार्टियां जिम्मेदार हैं।

जैसे ही अंग्रेज तामझाम समेट कर गए, नेहरू पहले प्रधानमंत्री बने। उन्होंने 15 अगस्त 1947 की सुबह होने से पहले ही शासन की बागडोर संभाल ली, लेकिन शासन की भाषा वही रखी अंग्रेजी, जिसमें अंग्रेज काम करते थे और जो भारतीय भाषा बिलकुल नहीं है। हिंदू लोग हिंदी के ज्यादा निकट हैं। हिंदी को भारत की प्रमुख भाषा होना चाहिए था, लेकिन उसमें भी राजनीति हुई। भाषा को लेकर दक्षिण में हिंसक आंदोलन हुए। कांग्रेस ने उसी तरह शासन चलाया, जैसा अंग्रेज छोड़ गए थे। कोई बदलाव नहीं। गांधीजी की हत्या हुई तो गोडसे की जाति के लोगों के खिलाफ दंगे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी। धर्म निरपेक्षता के नाम पर एक आततायी किस्म की राजनीति। पहले जो कांग्रेसी थे, वे देशभक्त कहलाते थे। आजकल भाजपा के लोग देशभक्त कहलाते हैं। इतिहास की किताबों में पाठ बदले जा रहे हैं। तमाम स्वतंत्रता सेनानियों को लेकर एक अजीबोगरीब राजनीतिक खुन्नस देख्रने में आ रही है।

दलितों ने अलग पार्टी बना ली है। पिछड़ी जातियों के लोगों की अलग पार्टियां हैं। मुसलमान कांग्रेस के समर्थक हैं, इसलिए कांग्रेस नेता भाजपा की आलोचना करते हैं तो पाकिस्तान की भाषा बोलने वाले कहलाते हैं। पाकिस्तान अपने देश में एक जबरदस्ती का राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। जो लोग हिंदुओं की भलाई के लिए कुछ नहीं कर पाते, वे पाकिस्तान के विरोध के नाम पर राजनीति करने लगते हैं। क्या मुसलमानों से लड़ाई-झगड़े पालना ही हिंदुओं का काम है?

भारतीय लोकतंत्र की राजनीति सर्वधर्म समभाव के आधार पर चलनी चाहिए। सर्वधर्म समभाव ही हिंदुत्व है। राजनीति विचारधारा के आधार पर होनी चाहिए। देशभक्त सभी हैं। किसी को भी देशभक्ति के खिलाफ घोषित करना ठीक नहीं। यह आपस में मतभेद रखने वालों का देश है। भाइयों में मतभेद होते हैं। बहनों में मतभेद होते हैं। पति-पत्नी में मतभेद होते हैं। पिता-पुत्र में मतभेद होते हैं। फिर भी सभी आपस में एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हैं। हिंदुओं में आपसी मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होता। यह विडंबना ही है कि राजनीतिक पार्टियां इस रास्ते पर नहीं चल रही है। यह राजनीतिक वातावरण हिंदुत्व के अनुकूल नहीं है।

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)