साथ पंक के हो लेकिन

नीरज से निस्संग रहो


श्वेत-श्याम जीवन सबका

सब मटमैले धूसर से 

जो बाहर से दिखता है

कौन यहाँ है अन्दर से

जैसे हो वैसे ही बन

तुम अपना ही रंग रहो


पुण्य-पाप के झगड़ों का

तुम निर्णय करते हो क्यूँ

सही-ग़लत की परिभाषा

अपनी ही गढ़ते हो क्यूँ

दर्पण ख़ुद का देख सको

बस इतना सा ढंग रहो


बात अक़्ल की सुनो मगर

हानि-लाभ से परे सुनो

और अकेलापन अपना

पूरे मन से ख़ूब गुनो

यदि प्रसन्न रहना है तो

अपने मन के संग रहो


हर रिश्ता अपना है पर

हर रिश्ता बेगाना है

ये जाना-पहचाना जग

हरदम ही अनजाना है

रहे डोर से जुड़े सदा

ऊँची उड़ी पतंग रहो


जब निस्संग ही आये हो

जब निस्संग ही जाना है

तो इस माया-मेले में

क्या ख़ुद को भरमाना है

बाहर के कोलाहल में

तुम साँसों का चंग रहो



लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)