हिंदुत्व की विचारधारा कसौटी पर


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।

आज हिंदुत्व की विचारधारा कसौटी पर है। आने वाले समय में जो इतिहास लिखा जाएगा, उसमें उल्लेख किया जाएगा कि हिंदुत्व के आधार पर राजनीति करने के क्या परिणाम रहे। हिंदुत्व एक जीवनशैली है। सदियों से कायम हैं। सरकारें आती-जाती रही हैं, हिंदुत्व की धारा गंगा की तरह सतत प्रवाहमान है। हिंदुत्व की विचारधारा में आधुनिक परिवर्तन को लेकर कट्टरता नहीं है। हिंदू लोग समय के अनुसार अपने रहन-सहन को बदल लेते हैं। उनके जीवन में कर्म प्रधान होता है। कोई नृप होए, हमें का हानी.....यह कहावत हिंदुओं के जीवन में अक्षरशः चरितार्थ होती है।

भारत में मनुष्य को अपनी योग्यता का विकास करने का पूरा अवसर मिलता है और यहां के लोग विभिन्न क्षेत्रों में चरम ऊंचाई तक पहुंचे हैं, जिसके कई प्रमाण है। सभी का जीवन धर्म पर आधारित रहा है। इतने सारे ऋषि-मुनि, महात्मा, बुद्ध, महावीर जैसे वैचारिक क्रांति करने वाले लोग और किसी देश में जन्म लेते हुए नहीं देखे गए हैं। यहां भले ही औद्योगिक मशीनीकरण नहीं हुआ हो, लेकिन मनुष्य का रहन-सहन, विचारधारा, व्यवहार आदि में कोई कमी नहीं है। आज देश की परिस्थिति देखकर हम अनुमान लगा सकते हैं कि दुनिया जिस रास्ते पर आगे बढ़ रही है, उसमें जीविकोपार्जन के लिए सरकार पर लोगों की निर्भरता बढ़ाने का काम प्रमुखता से हुआ है।

राजाओं के शासन में जनता को कपोल-कल्पित पौराणिक कथाओं के आधार पर उलझाने के प्रयास होते थे। अंग्रेजों के शासन में यह विचारधारा बनी कि भौतिक प्रगति के लिए हिंदुत्व की विचारधारा अनुकूल नहीं है। उन्होंने भारत में कई सामाजिक प्रयोग किए। अपनी सरकार की मजबूती के लिए उन्होंने हिंदुओं को एकजुट होने से रोकने और उन्हें अंग्रेजियत में ढालने के पूरे प्रयास किए। उनमें पहले से व्याप्त जातिवाद को बढ़ावा दिया। जातियों के आधार पर हिंदुओं का वर्गीकरण करते हुए, उन्हें छोटे-छोटे हिस्सों में बांट कर एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया गया। कुछ लोगों को दलितों के नाम पर तो कुछ लोगों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बढ़ावा दिया और जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो भारत की राजनीति पूरी तरह चूं-चूं का मुरब्बा बन चुकी थी।

इस तथ्य को नहीं भूला जा सकता कि 1857 में अंग्रेज सरकार के खिलाफ पहला आंदोलन धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने के बाद शुरू हुआ था। इससे पहले मुगलों के शासन का विरोध भी धार्मिक स्वतंत्रता में बाधा डालने के बाद शुरू हुआ। इस देश में कोई भी व्यक्ति अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप पसंद नहीं करता। वह सरकारी नियमों के अनुसार जीविकोपार्जन कर सकता है, लेकिन निजी रहन-सहन में वह अपने ही धर्म का पालन करता है। गौरतलब है कि कुछ हजार अंग्रेजों ने जब इतने बड़े देश पर शासन किया तो यहीं के लोगों के दम पर किया। उन्होंने अंग्रेजी पढ़ाकर लोगों को नौकरी देना शुरू किया और सिर्फ सौ साल में स्थिति यह हो गई कि अंग्रेजी का प्रभुत्व इस देश में बनने लगा और अंग्रेजी के नाम पर नई तरह का भ्रष्टाचार शुरू हुआ।

अंग्रेजी पढ़ने से अच्छी नौकरी मिलती है। यह बात समाज में स्थापित होने के बाद अब देश राष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्वयं की भाषा से भी वंचित है। इस देश में जो भी शासन करने आया, उसने अपनी राजमुद्राओं में देवनागरी लिपि का इस्तेमाल किया। अंग्रेजों ने इस देश के हिंदुओं के भाषाई संस्कार ही बदल दिए। अंग्रेजों के बाद जिस कांग्रेस ने शासन संभाला, उसने अंग्रेजी शासन प्रणाली हूबहू वैसे ही जारी रखने दी, जैसी अंग्रेज छोड़ गए थे, उस कांग्रेस के ज्यादातर नेता इंग्लैंड में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारत की राजनीति में आए थे।

वीर सावरकर हों या महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू हों यो मोहम्मद अली जिन्ना, बाबा साहेब अंबेडकर हो या वल्लभभाई पटेल, ये सभी लंदन का पानी पी चुके थे। इनमें सावरकर ने तो अंग्रेजों से माफी मांगकर कट्टर हिंदू का बाना पहन लिया और जवाहरलाल नेहरू अंग्रेजों के समर्थन से उनके अनुकूल सरकार चलाने वाले बने। अब देश में दो बड़े राजनीतिक गुट बने हुए हैं। एक सावरकर का समर्थन करता है, दूसरा सावरकर का विरोध करता है। सरकार वैसी ही है, जैसी अंग्रेज छोड़ गए थे और इन दोनों का राजनीतिक भेदभाव लोगों की जान पर आफत बना हुआ है।

मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह भ्रम बनाने का प्रयास चल रहा है कि देश अब हिंदुत्व के आधार पर चलेगा। लेकिन इसके पीछे जो खतरनाक नीतियां दिख रही हैं, वे भी समझ में आ रही हैं। आज सबकुछ आर्थिक ताकत के आधार पर चलता है। इस देश में जो सरकार अंग्रेज छोड़ गए थे, उसकी आर्थिक नीतियां अंतराराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से निर्देशित हैं और ये नीतियां भारतीय हिसाब से नहीं है। हिंदुत्व से भी उनका कोई संबंध नहीं है। ये नीतियां अमेरिका और ब्रिटेन के राजनीतिक हितों के ज्यादा अनुकूल है। क्या उन्हीं के हितों को पूरा करने के लिए हिंदुत्व के नाम से इस देश में भेड़चाल शुरू की जा रही है?

सभी हिंदुओं को यह समझना चाहिए। हिंदू अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं और धर्म को लेकर उनकी अपनी-अपनी विचारधाराएं हैं। हिंदुत्व उनके जीने का तरीका है। क्या हिंदुओं पर भेड़चाल में शामिल होने का ठप्पा लगना उचित है? हिंदुओं ने पिछले एक हजार साल से भी ज्यादा समय से इतनी तरह के शासन देख रखे हैं कि अगर भविष्य में कोई नई तरह की शासन व्यवस्था बनी तो वह भी भारत में ही बनेगी। यहां यूनानियों ने शासन किया, मुसलमानों ने शासन किया, मुगलों ने किया, पुर्तगालियों ने किया, फ्रांसीसियों ने किया, अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों के बाद धर्म निरपेक्षता के नाम पर कांग्रेस का साम्राज्य चला। अब हिंदुत्व के नाम पर भाजपा का शासन चल रहा है।

हिंदुत्व के नाम पर शासन एक अलग बात है और शासन पर कब्जा बनाए रखने के लिए हिंदुत्व का हथियार की तरह इस्तेमाल करना दूसरी बात। 2014 के लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व के नाम पर लोगों ने कांग्रेस को विदा कर दिया। 2019 में फिर भाजपा की सरकार बन गई। इसके बाद क्या होगा? हिंदुत्व के नाम पर राजनीतिक ईमानदारी कहां है? अगर सिर्फ एक पार्टी को जिताते रहना ही हिंदुत्व मान लिया गया है तो बात अलग है।

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)