प्रधान संपादक प्रवीण दत्ता की कलम से
सुबह सवेरे ' गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल' की आवाज़ वैसे तो राजधानी जयपुर की सभी अधिकृत कॉलोनियों में रोज़ाना गूंजती नहीं चाहे शहर के दोनों नगर निगम इन कचरा एकत्रित करने वाले हूटर के बारे में कुछ भी दावे करें। आपने अब तक राज्य और केंद्र सरकार के वे विज्ञापन देख ही लिए होंगे जिनमे मामूली लक्षण होने या एसिम्पटोमेटिक पॉजिटिव होने पर अस्पताल भागने की बजाय अपने घर में खुद को क्वारंटाइन करने की सलाह दी जा रही है। और यूँ भी अस्पताल तो अपने गेट पर कभी भी ताले लगा देतें हैं और फिर मरीज उसी गेट के सामने दम तोड़ते हुए भी दिख जातें हैं।
सरकारी और निजी अस्पतालों में भर्ती कुल कोविड मरीजों से दुगने - तिगने लोग अपने घरों में ही खुद को क्वारंटाइन कर इलाज ले रहें हैं और ठीक भी हो रहें हैं। यहाँ तक कोई दिक्कत नहीं। दिक्कत या कहें मुसीबत इसके बाद शुरू होती है। याद रखियेगा मैं अभी सिर्फ राजधानी जयपुर की चर्चा कर रहा हूँ। इस सम्पादकीय को पढ़ने के बाद पूरे प्रदेश की स्थिति का अन्दाज़ा आप खुद लगा लीजियेगा।
अब जब हर चौथे घर में कोविड मरीज खुद को क्वारंटाइन किये है तो निश्चित ही उस घर से निकलने वाले कचरे में उस मरीज का बायो मेडिकल वेस्ट भी होता होगा। कचरा एकत्रित करने वाला हूटर आता है और घर के बाकि कचरे के साथ इस बायो मेकल वेस्ट को भी अपने साथ ले जाता है। इस पूरे कचरे को हमेशा की तरह एक ही जगह डंप कर दिया जाता है। जिन घरों तक ये हूटर नहीं पहुंचते वे अपने आस पास खाली स्थान देखकर अपना कचरा फेंक देते हैं। यानि राजधानी जयपुर में बायो मेडिकल वेस्ट बिना नियमानुसार निस्तारण यूँही पड़ा है और कोई शक नहीं कि रोजाना सामने आ रहे नए पॉजिटिव केसों में अपनी भूमिका भी निभा ही रहा होगा। केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड द्वारा पिछले साल जारी किए गए दिशा निर्देशों के अनुसार स्थानीय निकायों को बायो मेडिकल वेस्ट को पीले रंग की थैली में घरो से लेकर अपने वाहन में अलग से रखे हुए लाल रंग के डिब्बे में रखकर अलग से निस्तारित करना होता है।
क्या ऐसा हो रहा ? कतई नहीं। खुद निगम के अधिकारी मानते हैं कि बायो मेडिकल वेस्ट तो वे सिर्फ चिकित्सा संस्थानों से एकत्रित करते हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि जिस संक्रमण के डर से मरे हुए स्वजन की अंत्येष्टि तक में प्रोटोकॉल लागू हो गए, उसी संक्रमण का बायो मेडिकल वेस्ट आपके चारों ओर ना जाने कहाँ कहाँ पड़ा संक्रमण को और गति दे रहा है और हमारा प्रशासन नाक ही नहीं आँखों पर भीं मास्क लगाए बैठा है।
महामारी से बड़ा शब्द मुझे मालूम नहीं और दिल से इच्छा है कि ऐसा कोई शब्द हो भी नहीं और ना ही कभी उसे लिखने की जरुरत किसी को भी पड़े। राज्य के मुख्यमंत्री बढ़ते कोरोना संक्रमण पर इतनी चिंता जता चुके हैं। क्या ही अच्छा हो कि जयपुर के दोनों निगमों के सभी ज़िम्मेदारों को दो टूक बायो मेडिकल वेस्ट के नियमानुसार निस्तारण सुनिश्चित करने का आदेश दें और सुनश्चित भी करें। प्रदेश की जनता को आपको भीलवाड़ा और रामगंज मॉडल से मिली ख्याति पर बहुत गर्व है पर अभी कोई नया जयपुर मॉडल का प्रयोग देखने का मन किसी जयपुरवासी का नहीं है। हाँ आपके के द्वारा उठाए गए हर सख्त कदम के साथ राजधांनी का हर नागरिक है।




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