जब भी मौसम खिज़ां का आता है
ये चमन अश्क़ क्यों बहाता है
न सही मन में अब कोई सूरज
एक जुगनू तो जगमगाता है
मैं तो ख़ुद में ही डूब जाता हूँ
जब मुझे देवता बुलाता है
छलछला उठ्ठी बज़्म की आँखें
कोई ऐसे भी गीत गाता है
सबका अपना ही लोभ होता है
कौन यूँ ही फ़रेब खाता है
मेरी आसानियाँ बढ़ा न बढ़ा
क्यों मेरी मुश्किलें बढ़ाता है
जब भी होता है सामने 'साहिल'
इक सफ़ीना क्यों डूब जाता है
लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


0 टिप्पणियाँ