कायस्थों की भूमिका
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
भारत में हिंदुत्व की मौजूदा स्थिति पर विचार करते समय यह ध्यान देना भी जरूरी है कि राजाओं और पुरोहितों की नीतियां बहुत पहले विदा हो चुकी हैं, जिन्होंने हिंदू समाज का ढांचा खड़ा करने में भूमिकाएं निभाई थीं। इनकी भेदभावपरक नीतियों का कुशलता से उपयोग करते हुए ब्रिटिश रणनीतिकारों ने भारतीय मनुष्यों का जमकर इस्तेमाल किया। अंग्रेजों को दुनिया में जहां भी आदमी भेजने की जरूरत होती थी, वे भारतीयों को भेज देते थे। राजाओं-पुरोहितों की मिलीभगत से हिंदू समाज का ढांचा इतना जर्जर हो चुका था कि ज्ञान और संस्कार विहीन लोग कहीं भी किसी भी तरह इस्तेमाल किए जा सकते थे। आज जो भारतीय सेना है, उसके इतिहास में यह भी शामिल है कि अंग्रेजों के शासन में उसने कहां कितनी लड़ाइयां लड़ीं। अंग्रेजों ने सेना का गठन करते समय रेजिमेंटों को जाति के आधार पर बांटा, जैसे जाट रेजीमेंट, सिख रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट, गोरखा रेजीमेंट आदि। इस सेना का उपयोग अंग्रेज सरकार ने कई जगह किया।
आज हिंदू जागरूक स्थिति में हैं और किसी जाति-विशेष के मार्गदर्शन से उनका जीवन नहीं चलता है। भारतीय ज्ञान के भंडार पर कॉपीराइट रखने वाली ब्राह्मण जाति अब पहले जैसी नहीं रही। लिखने-पढ़ने वाले ब्राह्मणों के अलावा भी बहुत लोग हो गए हैं। जब से लेखन कार्य शुरू हुआ, तब से ही राजाओं के प्रशासन में लेखकीय कार्य करने वालों की पूछपरख बढ़ने लगी थी। ब्राह्मणों का शिक्षा पर अधिकार था। वे अधिकतर लेखकीय कार्य ही करते थे। लेकिन हर तरह का लेखकीय कार्य करने के लिए ब्राह्मण पर्याप्त नहीं थे, इसलिए कायस्थों का उदय हुआ, जो चित्रगुप्त के वंशज माने जाते हैं। दीपावली के बाद जिस दिन भाई दूज मनाई जाती है, उस दिन कायस्थ चित्रगुप्त जयंती मनाते हैं और कलम की पूजा करते हैं।
एक मान्यता के अनुसार कायस्थ जाति का विकास हिंदुओं की उपजाति के रूप में गुप्त काल में हुआ। पुराणों के अनुसार कायस्थ प्रशासनिक कार्यों का निर्वहन करते हैं। हिंदू मान्यता के अनुसार कायस्थ धर्मराज श्री चित्रगुप्त के वंशज हैं। चित्रगुप्त एक प्रमुख हिंदू देवता हैं। धर्मराज चित्रगुप्त अपने दरबार में मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखकर न्याय करने वाले बताए गए हैं। चित्रगुप्त शब्द का गंभीर अर्थ है। विज्ञान से भी साबित हुआ है कि मन में जो भी विचार आते हैं, वे सभी चित्रों के रूप में होते हैं। भगवान चित्रगुप्त इन सभी विचारों के चित्रों को गुप्त रूप से संचित करके रखते हैं और अंत समय में ये सभी चित्र सामने रखते हैं। उसके आधार पर मनुष्य के अगले जन्म का फैसला होता है। भगवान चित्रगुप्त सृष्टि के प्रथम न्यायाधीश हैं। उन्हें न्याय का देवता माना जाता है। मनुष्यों की मौत के बाद धरती पर उनके कार्यों के आधार पर उनके लिए स्वर्ग या नरक का फैसला करने का अधिकार चित्रगुप्त के पास है।
चित्रगुप्त की संतान होने और देवता कुल में जन्म लेने के कारण कायस्थों को पंडित और क्षत्रिय, दोनों के धर्म धारण करने का अधिकार है। हालांकि कई जातिवादी ब्राह्मण कायस्थों को शूद्रों की श्रेणी में रखते हैं। वर्तमान में कायस्थों की मौजूदगी उनके उपनामों से देखी जा सकती है। इनमें श्रीवास्तव, सिन्हा, सिंह, सक्सेना, अंबष्ट, निगम, माथुर, भटनागर, लाभ, लाल, बसु, शास्त्री, कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, बिसारिया, कर्ण, वर्मा, खरे, राय, सुरजध्वज, विश्वास, सरकार, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, श्रेष्ठ, प्रभु, ठाकरे, आडवाणी, नाग, गुप्त, रक्षित, सेन, बक्शी, मुंशी, दत्ता, देशमुख, पटनायक, नायडू, सोम, पाल, राव, रेड्डी, दास, मंडल, मेहता आदि शामिल हैं।
स्वामी विवेकानंद कायस्थ थे और उन्होंने अपनी जाति के बारे में कहा है- ‘मैं उन महापुरुषों का वंशधर हूं, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विशुद्ध रूप से क्षत्रिय हैं। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो तो इन समाज सुधारकों को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने जमाने में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त कई शताब्दियों तक आधे भारत पर शासन किया था। यदि मेरी जाति की गणना छोड़ दी जाए, तो भारत की वर्तमान सभ्यता का क्या शेष रहेगा? अकेले बंगाल में ही मेरी जाति के सबसे बड़े कवि, इतिहासवेत्ता, दार्शनिक, लेखक और धर्म प्रचारक हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक (जगदीश चंद्र बसु) से भारतवर्ष को विभूषित किया है। स्मरण करो एक समय था, जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था। कश्मीर में दुर्लभ बर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण्य में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश तथा मध्य भारत में सातवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं। अतः हम उन राजवंशों की संतानें हैं। हम केवल बाबू बनने के लिए नहीं, अपितु हिंदुस्तान में प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिंदू संस्कृति की स्थापना के लिए पैदा हुए हैं।‘
हम समझ सकते हैं कि हिंदू समाज में कायस्थों का क्या योगदान है। न्यायाधीश, मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी आदि-इत्यादि कई महत्वपूर्ण पदों पर कायस्थों की मौजूदगी देखी जा सकती है। प्रधानमंत्रियों में लाल बहादुर शास्त्री कायस्थ थे। जिस हिंदुत्व को राजनीतिक आधार पर सत्ता में रहने का माध्यम बनाने का प्रयास हो रहा है, वह हिंदुत्व की मूल भावना के विपरीत बात है। जातियों और वर्गों में बंटे हुए हिंदुओं को सिर्फ एक राजनीतिक दिशा में बलपूर्वक ले जाने के प्रयास कहां तक सफल हो पाएंगे, यह तो भविष्य ही तय करेगा। लेकिन इससे एक बगीचे की उजाड़ प्रक्रिया अवश्य शुरू हो चुकी है। जो वास्तविक हिंदू हैं, वे अभी भी ठौर-ठिकाने की तलाश में ही रहते हैं। इस भूभाग में इतनी बार युद्ध, विस्थापन आदि हुए हैं कि विशालकाय हो रहे शहरों में कौन कहां का है, तय करना मुश्किल है।
इस देश का स्वरूप अंग्रेज सरकार की रीति-नीति से तय हुआ है और अंग्रेजों ने यहां के लोगों को ही अंग्रेजी पढ़ाकर नौकरियां देकर एक अलग आभिजात्य वर्ग विकसित कर दिया है जो उस तरह से हिंदुत्व आधारित देशभक्त नहीं हो सकता, जैसी अपेक्षा की जाती है। जो भी नौकरी करता है, वह आदेश का पालन करता है। पहले लोग मुगल बादशाह की, फिर अंग्रेज सरकार की नौकरी करते थे। अब भारत सरकार की नौकरी करते हैं या किसी निजी या कॉर्पोरेट कंपनी की नौकरी करते हैं। भारत सरकार संविधान के अनुसार चलती है। सरकार चलाने वाले सर्वेसर्वा होते हैं। हर पांच साल में चुनाव होते हैं। जनता के बहुमत से सरकार बनती है। पूरा ढांचा अंग्रेज ही फिट करके गए हैं। अंग्रेजों के जाने के बाद जरा भी बदलाव नहीं है, लेकिन सत्ता का दुरुपयोग करने वालों का एक भयानक वर्ग अवश्य पैदा हो गया है, जो हिंदुत्व के प्रति आस्था रखने वालों के सामने बहुत बड़ी चुनौती है।
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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