बाबूजी पर कैसा मरती थी अम्मा
बूढ़ी थी पर ख़ूब सँवरती थी अम्मा
तुलसी-चौरा हो या पूजा की थाली
घी का दीपक ख़ुद ही धरती थी अम्मा
घर में जब भी कोई मंगल उत्सव हो
अद्भुत गीतों में तब झरती थी अम्मा
जब भी कोई बात बिगड़ती लगती थी
समाधान के साथ उभरती थी अम्मा
रोता-रोता भी मैं हँसने लगता था
ज़रा गुदगुदी जब भी करती थी अम्मा
माथे पर हल्की-हल्की सी थपकी दे
सारी पीड़ा पल में हरती थी अम्मा
सारे रस्ते क़दमों में बिछ जाते थे
मुझको ले जिस ओर गुज़रती थी अम्मा
वो ही तेल-मसाले सब हैं खाने में
स्वाद कहाँ वो जैसा भरती थी अम्मा
अनपढ़ थी पर ज्ञान बहुत व्यवहारिक था
पढ़े-लिखों से सिवा ठहरती थी अम्मा
हम बच्चों को खेल कोई मिल जाता था
तिलचट्टों से कितना डरती थी अम्मा
ओछेपन पर आगबबूला होती थी
बड़बोलों को बहुत अखरती थी अम्मा
देख मेरे बालों की चाँदी कल 'साहिल'
दूर चाँद पर बैठ सिहरती थी अम्मा
लोकेश कुमार सिंह
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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