हिंदुत्व, धार्मिक कर्मकांड और महाभारत  


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।  

 

इस समय हिंदुत्व का जोर है। हिंदुत्व को महानता से जोड़ा जाता है। महानता का संबंध व्यक्ति के चरित्र से होता है। इसलिए हमें इस पर विचार अवश्य करना चाहिए कि इस देश में प्रजा का पालन करने वाले राजागण और उनके परिजन चरित्र की दृष्टि से कितने महान थे। भारत में ब्राह्मणों ने जनता को विभिन्न कर्मकांडों में जकड़कर रखा है। जो लोग इन कर्मकांडों को उचित नहीं मानते हैं, वे धर्मविरोधी मान लिए जाते हैं। यहां कर्मकांड का विरोध करने का उद्देश्य नहीं है। वेदों की मूल शिक्षा क्या है, यह प्रकरण सदियों पहले बहुत पीछे छूट गया है। अब सिर्फ पौराणिक कथाओं के आधार पर ही हिंदू धर्म को प्रचलित बनाए रखने के प्रयास हो रहे हैं।

कई लोग पौराणिक कथाओं की सत्यता पर संदेह करते हैं, लेकिन हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले लोग विभिन्न पौराणिक कथाओं और टोनों-टोटकों के आधार प्रचलित त्योहारों, पर्वों को नियमित और निरंतर मनाते हुए हिंदू धर्म का अस्तित्व बनाए हुए हैं। ऐसे लोगों को राजनीतिक उद्देश्य से एक दल विशेष का समर्थन करने के लिए बाध्य करने का नाम ही हिंदुत्व की स्थापना है तो यह उचित है या अनुचित, समझदार और विवेकसंपन्न लोग जानें। लेकिन तथ्य यही है कि किसी भी धार्मिक कर्मकांड का धर्म की मूल भावना से विशेष संबंध नहीं होता है।

सार्वजनिक रूप से धर्म की स्थापना की घोषणा करने के उद्देश्य से जनमानस को समूहबद्ध करने के लिए इस तरह के कर्मकांड रचे जाते हैं। यह कार्य राजाओं के शासन में बहुत होता था। इस प्रकार अधिकांश कर्मकांड सामंतशाही के उत्पाद माने जा सकते हैं। कुछ त्योहार अवश्य समाजहित में जुटे ऋषियों की प्रेरणा से प्रकृति और पर्यावरण का महत्व जनसाधारण को समझाने के लिए रचे गए हैं, जैसे पेड़, नदी, जलस्रोत, पर्वत आदि की पूजा, लेकिन अधिकतर त्योहार राजाओं के शासन में रचे गए प्रतीत होते हैं।

जहां तक चरित्र की बात है तो महाभारत काल की कथाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दुष्यंत और शकुंतला का प्रेम, भरत का जन्म, कालांतर में शांतनु का जन्म, सत्यवती के प्रति उनकी आसक्ति, सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य की रानियों के गर्भ से योग्य पुत्र का जन्म सुनिश्चित करने के लिए सत्यवती का वेद व्यास से अनुरोध। वेद व्यास का अंबिका, अंबालिका और अंबिका की एक दासी के साथ संभोग करना, इसके फलस्वरूप धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म। इसके बाद धृतराष्ट्र का गांधारी से विवाह। पांडु का कुंती और माद्री से विवाह। गांधारी ने पति परमेश्वर की भक्ति के वशीभूत होकर पति को दृष्टिहीन देख स्वयं की आंखों पर भी पट्टी बांध ली थी। विचित्रवीर्य के बाद धृतराष्ट्र के नेत्रहीन होने के कारण उनके छोटे पुत्र पांडु को राजा बनाया गया।

पांडु की पत्नी ने एक बार विवाह से पूर्व एक वर्ष तक दुर्वासा ऋषि की सेवा की थी। इसके फलस्वरूप दुर्वासा ने उन्हें वरदान दिया था कि वह किसी भी देवता का स्मरण और आह्वान करके उसके समान पुत्र उत्पन्न कर सकती है। उस समय कुंती का विवाह नहीं हुआ था। उन्होंने सिर्फ वरदान की परीक्षा करने के लिए सूर्य का स्मरण और आवाहन किया तो उन्हें सूर्य जैसे प्रतापी बालक को जन्म देना पड़ा, जिसे लोकलाज के भय से बचने के लिए उन्होंने एक पेटिका में बंद कर गंगा में प्रवाहित कर दिया था। कालांतर में वह युवक महाबली, युद्ध निपुण, दानवीर कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसके बाद कुंती का विवाह पांडु के साथ हुआ था।

पांडु किसी पुत्र को जन्म नहीं दे सके। उनके वंश की रक्षा के लिए कुंती ने धर्मराज का आवाहन करके धर्मराज युधिष्ठिर, वायु का आवाहन करके बलवान भीम और इंद्र का आवाहन कर सर्वगुण संपन्न अर्जुन को जन्म दिया था। यह मंत्र उन्होंने अपनी सौत माद्री को भी सिखा दिया था, जिससे वह अश्विनी कुमारों का आवाहन करके नकुल, सहदेव को जन्म देने में सफल रही।

पांडु के परिवार में जन्मे इन पांच पुत्रों को पांडव नाम से जाना गया। जब वे बच्चे थे, तब पांडु का निधन हो गया। तब धृतराष्ट्र को राजा बनाया गया और भीष्म हस्तिनापुर राज्य के संरक्षक बने रहे। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी ने एक भारी मांस पिंड को जन्म दिया था, जिसके विभाजन से उनके सौ पुत्र हुए, जो बाद में कौरव कहलाए। दुर्योधन धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र था और पिता के बाद स्वयं को हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी मानता था। उस समय द्रोणाचार्य नामक ब्राह्मण क्षत्रिय राजकुमारों को शिक्षा देते थे। उन्होंने पांडवों और कौरवों को भी शिक्षा दी थी और हस्तिानापुर राज्य में सम्मान और संरक्षण प्राप्त कर राजदरबार में स्थान बनाया था।

दुर्योधन की हठधर्मिता के कारण पांडवों और उनके परिवार को राज्य से अलग करने के बहुतेरे प्रयास हुए। धृतराष्ट्र ने भी पक्षपात किया। नियम और परंपरा के अनुसार हस्तिनापुर का राज्य युधिष्ठिर को संभालना था, लेकिन उन्हें षड्यंत्रपूर्वक राज्य से बाहर रखने के लिए द्यूत क्रीड़ा रची गई और उसमें पांडवों को पराजित कर उन्हें बारह बरस वनवास में व्यतीत करने के लिए विवश किया गया। इसमें गांधारी के भाई दुर्योधन के मामा शकुनि की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस द्यूत क्रीड़ा के दौरान धर्म का अत्यंत उपहास हुआ। पांचों पांडवों की एकमात्र पत्नी द्रौपदी को दुर्योधन का भाई दुशासन उसके आवास से पकड़कर जबरन राजदरबार में खींच लाया और उसको निर्वस्त्र करने का प्रयास किया। तब कृष्ण ने द्रौपदी की पुकार पर सहायता की थी और उनके वस्त्र बचाकर सम्मान की रक्षा की थी। यह एक राजा के दरबार में परिवार की ही एक महिला को सार्वजनिक रूप से यौन प्रताड़ना देने का मामला था।हिंदुत्व, धार्मिक कर्मकांड और महाभारत  

इस समय हिंदुत्व का जोर है। हिंदुत्व को महानता से जोड़ा जाता है। महानता का संबंध व्यक्ति के चरित्र से होता है। इसलिए हमें इस पर विचार अवश्य करना चाहिए कि इस देश में प्रजा का पालन करने वाले राजागण और उनके परिजन चरित्र की दृष्टि से कितने महान थे। भारत में ब्राह्मणों ने जनता को विभिन्न कर्मकांडों में जकड़कर रखा है। जो लोग इन कर्मकांडों को उचित नहीं मानते हैं, वे धर्मविरोधी मान लिए जाते हैं। यहां कर्मकांड का विरोध करने का उद्देश्य नहीं है। वेदों की मूल शिक्षा क्या है, यह प्रकरण सदियों पहले बहुत पीछे छूट गया है। अब सिर्फ पौराणिक कथाओं के आधार पर ही हिंदू धर्म को प्रचलित बनाए रखने के प्रयास हो रहे हैं।

कई लोग पौराणिक कथाओं की सत्यता पर संदेह करते हैं, लेकिन हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले लोग विभिन्न पौराणिक कथाओं और टोनों-टोटकों के आधार प्रचलित त्योहारों, पर्वों को नियमित और निरंतर मनाते हुए हिंदू धर्म का अस्तित्व बनाए हुए हैं। ऐसे लोगों को राजनीतिक उद्देश्य से एक दल विशेष का समर्थन करने के लिए बाध्य करने का नाम ही हिंदुत्व की स्थापना है तो यह उचित है या अनुचित, समझदार और विवेकसंपन्न लोग जानें। लेकिन तथ्य यही है कि किसी भी धार्मिक कर्मकांड का धर्म की मूल भावना से विशेष संबंध नहीं होता है।

सार्वजनिक रूप से धर्म की स्थापना की घोषणा करने के उद्देश्य से जनमानस को समूहबद्ध करने के लिए इस तरह के कर्मकांड रचे जाते हैं। यह कार्य राजाओं के शासन में बहुत होता था। इस प्रकार अधिकांश कर्मकांड सामंतशाही के उत्पाद माने जा सकते हैं। कुछ त्योहार अवश्य समाजहित में जुटे ऋषियों की प्रेरणा से प्रकृति और पर्यावरण का महत्व जनसाधारण को समझाने के लिए रचे गए हैं, जैसे पेड़, नदी, जलस्रोत, पर्वत आदि की पूजा, लेकिन अधिकतर त्योहार राजाओं के शासन में रचे गए प्रतीत होते हैं।

जहां तक चरित्र की बात है तो महाभारत काल की कथाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दुष्यंत और शकुंतला का प्रेम, भरत का जन्म, कालांतर में शांतनु का जन्म, सत्यवती के प्रति उनकी आसक्ति, सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य की रानियों के गर्भ से योग्य पुत्र का जन्म सुनिश्चित करने के लिए सत्यवती का वेद व्यास से अनुरोध। वेद व्यास का अंबिका, अंबालिका और अंबिका की एक दासी के साथ संभोग करना, इसके फलस्वरूप धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म। इसके बाद धृतराष्ट्र का गांधारी से विवाह। पांडु का कुंती और माद्री से विवाह। गांधारी ने पति परमेश्वर की भक्ति के वशीभूत होकर पति को दृष्टिहीन देख स्वयं की आंखों पर भी पट्टी बांध ली थी। विचित्रवीर्य के बाद धृतराष्ट्र के नेत्रहीन होने के कारण उनके छोटे पुत्र पांडु को राजा बनाया गया।

पांडु की पत्नी ने एक बार विवाह से पूर्व एक वर्ष तक दुर्वासा ऋषि की सेवा की थी। इसके फलस्वरूप दुर्वासा ने उन्हें वरदान दिया था कि वह किसी भी देवता का स्मरण और आह्वान करके उसके समान पुत्र उत्पन्न कर सकती है। उस समय कुंती का विवाह नहीं हुआ था। उन्होंने सिर्फ वरदान की परीक्षा करने के लिए सूर्य का स्मरण और आवाहन किया तो उन्हें सूर्य जैसे प्रतापी बालक को जन्म देना पड़ा, जिसे लोकलाज के भय से बचने के लिए उन्होंने एक पेटिका में बंद कर गंगा में प्रवाहित कर दिया था। कालांतर में वह युवक महाबली, युद्ध निपुण, दानवीर कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसके बाद कुंती का विवाह पांडु के साथ हुआ था।

पांडु किसी पुत्र को जन्म नहीं दे सके। उनके वंश की रक्षा के लिए कुंती ने धर्मराज का आवाहन करके धर्मराज युधिष्ठिर, वायु का आवाहन करके बलवान भीम और इंद्र का आवाहन कर सर्वगुण संपन्न अर्जुन को जन्म दिया था। यह मंत्र उन्होंने अपनी सौत माद्री को भी सिखा दिया था, जिससे वह अश्विनी कुमारों का आवाहन करके नकुल, सहदेव को जन्म देने में सफल रही।

पांडु के परिवार में जन्मे इन पांच पुत्रों को पांडव नाम से जाना गया। जब वे बच्चे थे, तब पांडु का निधन हो गया। तब धृतराष्ट्र को राजा बनाया गया और भीष्म हस्तिनापुर राज्य के संरक्षक बने रहे। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी ने एक भारी मांस पिंड को जन्म दिया था, जिसके विभाजन से उनके सौ पुत्र हुए, जो बाद में कौरव कहलाए। दुर्योधन धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र था और पिता के बाद स्वयं को हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी मानता था। उस समय द्रोणाचार्य नामक ब्राह्मण क्षत्रिय राजकुमारों को शिक्षा देते थे। उन्होंने पांडवों और कौरवों को भी शिक्षा दी थी और हस्तिानापुर राज्य में सम्मान और संरक्षण प्राप्त कर राजदरबार में स्थान बनाया था।

दुर्योधन की हठधर्मिता के कारण पांडवों और उनके परिवार को राज्य से अलग करने के बहुतेरे प्रयास हुए। धृतराष्ट्र ने भी पक्षपात किया। नियम और परंपरा के अनुसार हस्तिनापुर का राज्य युधिष्ठिर को संभालना था, लेकिन उन्हें षड्यंत्रपूर्वक राज्य से बाहर रखने के लिए द्यूत क्रीड़ा रची गई और उसमें पांडवों को पराजित कर उन्हें बारह बरस वनवास में व्यतीत करने के लिए विवश किया गया। इसमें गांधारी के भाई दुर्योधन के मामा शकुनि की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस द्यूत क्रीड़ा के दौरान धर्म का अत्यंत उपहास हुआ। पांचों पांडवों की एकमात्र पत्नी द्रौपदी को दुर्योधन का भाई दुशासन उसके आवास से पकड़कर जबरन राजदरबार में खींच लाया और उसको निर्वस्त्र करने का प्रयास किया। तब कृष्ण ने द्रौपदी की पुकार पर सहायता की थी और उनके वस्त्र बचाकर सम्मान की रक्षा की थी। यह एक राजा के दरबार में परिवार की ही एक महिला को सार्वजनिक रूप से यौन प्रताड़ना देने का मामला था। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)