हिंदू, हिंदुत्व और भारतीय राजनीति
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
हिंदू, हिंदुत्व और भारतीय राजनीति। ये तीन अलग-अलग धाराएं हैं। धर्म को इस देश में राजनीति से अलग ही रखा गया है। प्राचीन काल में पूरे भारत को एकजुट करने के लिए चाणक्य ने सनातन विचारधारा का आश्रय लेकर शासन की रीति-नीति तय करने में महत्वपूर्ण सलाहकार की भूमिका निभाई थी। वह स्वयं कभी राजा नहीं बने। उन्होंने चंद्रगुप्त को चक्रवर्ती सम्राट बनाया। लेकिन चाणक्य के बाद कालांतर में चक्रवर्ती शासन बिखरने लगा और आम जनता की राजनीति से दूरी बढ़ने लगी। उस समय भारतीय समाज इस कदर रीति-रिवाजों में उलझा हुआ था कि किसी के पास और कुछ सोचने का अवकाश ही नहीं रहता था। पंचांग के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों के ब्राह्मण वहां के राजाओं को मार्गदर्शन देते थे कि किस माह की किस तिथि के दिन क्या पर्व होना चाहिए, उसके हिसाब से पूरे समाज की दिनचर्या तय करने का प्रयास किया जाता था। वह आज परंपरागत रूढि़यों के रूप में हमारे सामने है।
हर त्योहार पंचांग की किसी न किसी विशेष तिथि से जुड़ा हुआ है। पंचांग की रचना अद्भुत ज्ञान संपन्न विद्वान ऋषियों ने की है, जिसमें सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु-केतु की गति के आधार पर जो कालगणना हुई है, वह भारत में ही संभव हो पाया है और इस तथ्य का खंडन करने के लिए कोई भी तर्क-वितर्क किसी भी धर्मावलंबी के पास नहीं है। पंचांग और ज्योतिष का ज्ञान ब्राह्मणों को रहा है, इसमें भी कोई मतभेद नहीं हो सकता। बड़े-बड़े राजा ज्योतिषियों से सलाह लिया करते थे। राजा ज्योतिषियों की सलाह से नीतियां तय करते थे। ब्राह्मणों की अपनी चालाकी होती थी और राजाओं के अपने स्वार्थ, जिससे राजा महान से महान बनते चले गए और ब्राह्मण बुद्धिमान से बुद्धिमान घोषित होते रहे।
कमाल की बात यह है कि हर राजा का काल उस जमाने का स्वर्णिम इतिहास है और वहां का राजा राजाधिराज, महाराजाधिराज। राजा का चरित्र भले ही दो कौड़ी का रहा हो, उसके ब्राह्मण सलाहकार उसे महान ही बताते थे। किसी भी काल का इतिहास देख लीजिए। सभी राजा महान थे। प्रजा का भला चाहने वाले थे। यहां तक कि भारत पर हमला करने वाले भी महान थे। हुमायूं भी, बाबर भी, अकबर भी, जहांगीर भी, शाहजहां भी, सभी महान थे। इसी तरह जितने धर्म इस धरती पर पैदा हुए या बाहर से आए, वे भी सब महान हैं, श्रेष्ठ हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं। समरथ को नहिं दोष गुसाईं।
महानता का इतना बड़ा गट्ठर लादे हुए हम भारतीयों के साथ फिर ऐसी कौनसी गड़बड़ हो गई कि आज सब कुछ न कुछ सीखकर रोबोट की तरह काम करते दिखाई देते हैं। आज पूरी दुनिया में भारतीयों से ज्यादा कोई कार्यकुशल व्यक्ति मिल सकता है क्या? कोई सा भी कर्म हो, व्यापार, इंजीनियरिंग, तकनीकी मजदूरी, हम्माली, सेवा कार्य आदि इत्यादि, भारतीयों की मौजूदगी करीब-करीब हर आधुनिक देश में है। फिर भारत खुद ऐसा क्यों है?
आज आधुनिक लोकतंत्र है। देश के स्वतंत्र होने के बाद जो राजनीति धर्म निरपेक्षता पर आधारित थी, वह अब हिंदुत्व आधारित हो रही है। लेकिन यह हिंदुत्व आधारित राजनीति सिर्फ सत्ता हासिल करने तक सीमित है। इससे आगे का रास्ता क्या है? दीपावली भी हिंदुत्व के आधार पर ही मनाई जाती है। अगर किसी से पूछा जाए कि दीपावली क्यों मना रहे हो, तो वह क्या जवाब देगा? यही कि वह हिंदू है या यह हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार है। इस त्योहार के बारे में तमाम खोजबीन करने से पता चलता है कि इस त्योहार पर कभी कोई लड़ाई-झगड़े नहीं हुए। युद्ध भी अगर होते थे तो दीपावली के मौके पर थम जाते थे। तमाम राजा और उनके सैनिक युद्धकर्म रोककर अपने-अपने घरों में दीपावली मनाने के लिए पहुंच जाते थे। प्रजा के अन्य लोग भी अपनी जीविका से संबंधित कार्य रोककर दीपावली पर सद्भावना के मोड में आ जाते थे। इसी लिए कहावत बनी है, सदा दिवाली संत की, बारह मास बसंत। अर्थात दीपावली के त्योहार पर सभी हिंदुओं की जो मनोदशा होती है, वही मनोदशा संत की हर समय रहती है। इसका अत्यंत गूढ़ अर्थ है, जो ज्यादा लोग नहीं समझते हैं। हालांकि अन्य धर्मावलंबियों के भी प्रेम और भाईचारे का संदेश देने वाले अद्भुत त्योहार होते हैं, जैसे मुसलमानों में ईद और ईसाइयों में क्रिसमस। ये त्योहार भी दीपावली की तरह ही मनाए जाते हैं। तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। मनोदशा एक जैसी होती है। उमंग और उल्लास से परिपूर्ण। त्योहारों पर रोजमर्रा के लड़ाई-झगड़े स्थगित हो जाते हैं।
जो धर्म भारत में विकसित हुए, जैसे बौद्ध, जैन और सिख, उनका सबसे भी बड़ा त्योहार दीपावली ही है। धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं, धर्मशास्त्र अलग-अलग होने के बावजूद दीपावली सभी का सबसे बड़ा त्योहार है। त्योहार से जुड़ी कथाएं अलग-अलग हैं, लेकिन तिथि एक ही है, कार्तिक अमावस्या। जैनियों का अलग धर्म बन गया। अलग धर्मग्रंथ बन गए। एक अलग दर्शन बन गया। धर्म में अहिंसा भी जुड़ गई। अलग पंचांग भी बन गया और उसके आधार पर अलग संवत की घोषणा भी हो गई। लेकिन पंचांग की रचना सबसे पहले तो किसी न किसी ऋषि ने की थी, और जितने भी पंचांग बने हैं, सभी की तिथि गणना प्रकारांतर से समान ही है। यह गणना इस तरह सटीक होती है कि एक लाख वर्ष बाद किस माह और तिथि में कितने समय तक चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण होगा, उसका एकदम सही समय बताना संभव है। यह सब वैज्ञानिक विकास के पहले की बात है।
अब समस्या यह है कि पंचांग जैसी चीज बना लेने के बाद भारतीयों को ऐसा क्या वैराग्य हो गया जो इस भूमि पर वैज्ञानिक विकास नहीं हो पाया। यहां न मोटर बनी और न ही पेट्रोल, डीजल जैसे ईंधन की खोज हुई। यहां लड़ाई-झगड़े बहुत होते थे। युद्ध भी बहुत हुए, लेकिन बारूद का इस्तेमाल करके बंदूक और तोप बनाने का विचार किसी के मन में नहीं आया। तोप भी भारत में सबसे पहले बाबर ही लेकर आया था।
यहां के जन समुदाय को इस कदर साधनहीन रखा गया कि जहां एक से एक शानदार मंदिर और किले बने, वहीं जन साधारण के लिए सुविधाओं से युक्त बस्तियां विकसित नहीं हो पाईं। कामवासना का शमन करने के लिए इस कदर शास्त्र रचे गए और तरह-तरह की दवाइयां खोजी गई कि इस दिशा में इतना काम और किसी भी देश में नहीं हुआ। यहां वात्स्यायन जैसे ऋषि भी हुए, जिन्होंने कामसूत्र की रचना की और जिससे आज करोड़ों लोग लाभान्वित हो रहे हैं। कामसूत्र ब्रांड के एक कंडोम ने अच्छा खासा कारोबार जमा रखा है।
समुद्र पार करके पहली बार पुर्तगाली आए, फ्रांसीसी आए, अंग्रेज आए। अंग्रेजों ने यहां अपनी एक अलग भाषा चला दी और उसे भौतिक विकास से जोड़ दिया। इसका परिणाम यह है कि आज जिसको भारत में सहूलियत से जीवन बिताना है, उसे अंग्रेजी सीखना जरूरी है। शुरू में ईसाइयों की मिशनरी पद्धति से अंग्रेजी पाठ्यक्रम के स्कूल खुले। धीरे-धीरे उसी तरह के स्कूल सरकार ने भी पूरे देश में खोले और भारतीयों से जुड़े परंपरागत ज्ञान को अंग्रेजों की ओर से प्रवर्तित शिक्षा प्रणाली से अलग रखा गया। इस तरह शिक्षा की धारा अलग हो गई, धर्म की धारा अलग हो गई और वह विभिन्न कर्मकांडों, रीति-रिवाजों के रूप में भारतीय घरों में जीवित है।
आज जो भी तरक्की किए हुए लोग हैं, वे अंग्रेजों की तरफ से विकसित शिक्षा प्रणाली से पढ़े हुए हैं और उनका दिमाग दो तरह का है। घरों में, परिवार में, बेटे-बेटियों के लिए संबंध तय करने में उनकी पारंपरिक मान्यताएं अलग हैं, जिन्हें वे धार्मिक मान्यताएं भी समझते हैं। वे हिंदू भी हो सकते हैं, मुसलमान भी और ईसाई भी। सीताराम येचुरी वामपंथी विचारक के रूप में तरह-तरह की बातें कर सकते हैं, लेकिन अपने नाम सीताराम के उद्गम से वह पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं। इसी तरह जगन मोहन राजशेखर रेड्डी भले ही ईसाई हों और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए हों, लेकिन उनका नाम तो जगन मोहन और पिता का नाम राजशेखर ही है। इस तरह के कई उदाहरण हैं। हिंदू समाज के जातीय आतंक से त्रस्त होकर, इस्लामी हमलावरों के आतंक में आकर, ईसाइयों के सामुदायिक कार्यों से प्रभावित होकर और प्रलोभन में आकर कई लोगों ने धर्म बदला है। लेकिन इस तरह ठप्पा बदलने से क्या मनुष्य बदल जाता है? मनुष्य का डीएनए वही रहता है। हिंदुत्व पर विचार करते समय ये सारी बातें अपने आप दिमाग में आ जाती हैं।
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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