पिछले दिनों अनुपम खेर का एक बयान आया जिसमें उन्होंने कोरोना महामारी के कुप्रबन्धन को लेकर मोदी सरकार की नाकामियों और निकम्मेपन को स्वीकार किया । अब यह बात अलग कि दो दिन बाद ही वे यह कहते पाये गये कि ग़लतियाँ भी उसी से होती हैं जो काम करता है । बात के इस चतुर-बदलाव के पीछे की विवशता को बहुत ही आसानी से समझा भी जा सकता है ।


लेकिन क्या हम देश के पहले प्रधानमंत्री को भी इस कसौटी पर नहीं कस सकते कि जो काम करता है चूक भी उसी से होती है । 


क्या यह सच नहीं कि आज़ाद भारत में हुए हर अच्छे काम के पीछे या तो नेहरू ख़ुद खड़े हैं या उनकी सोच आधार बनी है । 


नेहरू विश्वनेता थे । उन्होंने 1927 में ही कह दिया था कि ब्रिटिश रूल से तो हम मुक्ति पा ही लेंगे लेकिन आने वाली दुनियाँ पर अमरीकी वर्चस्व का जो ख़तरा होगा , उससे हमें कौन मुक्ति दिलायेगा । 


नेहरू ही थे जो अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी की चुनाव सभा में यह कह सकते थे कि हमें पूरी जानकारी नहीं थी , हम एक ग़लत व्यक्ति को टिकट दे बैठे हैं , लेकिन मैं आपसे यह कहने आया हूँ कि इस आदमी को वोट मत देना । 


श्यामा प्रसाद मुखर्जी , राम मनोहर लोहिया , अटल बिहारी वाजपेयी , चन्द्रशेखर जैसे धुर-विरोधियों को नेहरू ने न केवल प्रोत्साहन दिया बल्कि उनके राजनीतिक कैरियर को पाला-पोसा भी ।


कवियों , शाइरों , लेखकों , साहित्यकारों , पत्रकारों , कार्टूनिस्टों , कलाकारों , फ़नकारों को जिस तरह का निजी प्रिविलेज प्रधानमंत्री नेहरू के यहाँ हासिल था , उसकी तो आज कल्पना तक नहीं की जा सकती । 


नेहरू ख़ुद इतने बड़े लेखक हैं कि उनकी पुस्तकों की रॉयल्टी आज भी भारत में सबसे अधिक है और जिनके बारे में पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने कहा था कि "नेहरू अगर सक्रिय राजनीति में नहीं होते तो नोबेल विजेता लेखक होते" । नेहरू की मौत पर अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में जो भाषण दिया था वैसा तो कोई कॉंग्रेसी भी नहीं दे सका । 


नेहरू पर मुस्लिम परस्त होने का आरोप लगाने वाले बहुत ही सुविधापूर्वक यह भूल जाते हैं कि ये नेहरू ही थे जिन्होंने कहा था कि "बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता के मुकाबले अधिक ख़तरनाक होती है" । याद रखिये कि यह बात उन्होंने उस समय के पाकिस्तान के सन्दर्भ में कही थी । 


अब यह बात अलग कि आज भारत उसी बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का बहुत तेज़ी से शिकार हो रहा है । इतना तेज़ी से कि पाकिस्तान की शाइरा फ़हमीदा रियाज़ को भी लिखना पड़ा कि "तुम भी हम जैसे निकले" । 


हम धर्म व पंथ/सम्प्रदाय का मूल अन्तर ही भूल चुके हैं । इस पंथ और सम्प्रदाय का हमारे जीवन में दख्ल और इसका राजनीति से गन्दा मेल इतना बढ़ गया है कि धर्म बहुत पीछे छूट गया है ।


और फिर नेहरू इतने बड़े तो हैं हीं कि वे आज भी लोगों को काम करने से रोक दे रहे हैं तथा जिनको रोज़ कोसे बिना आज की हुक़ूमत का मशरूमी-भोजन पचने से ही इन्कार कर देता है । 


लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)