दीपावली हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
दीपावली हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है और विश्व में जहां कहीं भी, कोई भी हिंदू उपस्थित है, वह इस त्योहार को याद करता है और संभव होने पर यह त्योहार मनाता है। भले ही यह त्योहार किसी भी कारण से मनाया जाता हो। दीपावली मनाने को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में कई पौराणिक कथाएं हैं, जिनके आधार पर यह त्योहार मनाया जाता है।
उत्तर भारत में दीपावली का त्योहार रामकथा पर आधारित है। उस समय राम रावण को मारकर लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या लौटे थे। कुछ हिंदुओं की मान्यता है कि इस दिन पांडवों का 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास समाप्त हुआ था। कई हिंदू दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी से जुड़ा मानते हैं। दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और असुरों के सागरमंथन से जन्मी लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। समुद्र मंथन के फलस्वरूप लक्ष्मी और धन्वंतरी का जन्म हुआ था।
दीपावली की रात को लक्ष्मी ने पति के रूप में विष्णु को चुना था और उनसे विवाह किया था। कुछ हिंदू दीपावली को विष्णु की वैकुण्ठ में वापसी के रूप में मनाते हैं। पूर्वी भारत के ओडिशा और पश्चिम बंगाल में हिंदू लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं। मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा त्योहार मानते हैं। इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। एक पौराणिक कथा यह भी है कि इसी दिन विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था।
सिखों के लिए दीपावली इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसी दिन अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था। ईसवी सन 1619 में दीपावली के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविंद सिंहजी को जहांगीर की जेल से रिहा किया गया था। जैनियों के अनुसार इस दिन चौबीसवें जैन तीर्थंकर भगवान महावीर को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। आर्य समाजियों के लिए दीपावली का महत्व इसलिए है कि इस दिन स्वामी दयानंद सरस्वती का अजमेर के पास देहांत हुआ था। पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ ने इसी दिन समाधि ली थी। बौद्धों के लिए दीपावली का महत्व यह है कि इस दिन बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध 17 वर्ष बाद अनुयायियों के साथ अपने गृह नगर कपिल वस्तु लौटे थे। तब उनके स्वागत में लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी। साथ ही महात्मा बुद्ध ने 'अप्पों दीपो भव' का उपदेश दिया था।
दीपावली हिंदुओं के लिए अलग-अलग कारणों से एक अद्भुत पर्व है। हम यह भी कह सकते हैं कि यह पर्वों का समूह है। नवरात्र के बाद दशहरा संपन्न होने के पश्चात दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस का त्योहार आता है, जिसमें अनिवार्य रूप से कुछ न कुछ खरीदारी होती है। इसके अगले दिन नरक चतुर्दशी, रूप चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम की पूजा होती है। अगले दिन अमावस्या को दीपावली का त्योहार होता है। इसके अगले दिन गोवर्धन पूजा का त्योहार होता है। इस दिन भगवान कृष्ण ने ब्रज के लोगों को इंद्र के कोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया था। इसकी याद में बैलों को सजाया जाता है और गोबर का छोटा सा पर्वत बनाकर उसकी पूजा की जाती है। इसके अगले दिन भाई दूज का त्योहार होता है, जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। वे दूकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्व है। खरीफ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। किसान अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाते हैं।
नेपाल में काठमांडो सहित सभी शहरों में दीपावरी का त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। परंपरा भारत जैसी ही है, लेकिन थोड़ी अलग है। नेपाली लोग दीपावली का पर्व शुरू होने पर पहले दिन कौवे को, दूसरे दिन कुत्ते को भोजन कराते हैं। तीसरे दिन लक्ष्मी पूजा होती है। इसी दिन से नेपाल संवत शुरू होता है। चौथा दिन नेपाल के नए साल के रूप में मनाया जाता है। इस दिन महापूजा होती है। पांचवे दिन भाई टीका का पर्व होता है, जिसमें बहनें भाइयों का तिलक करती हैं। दीपावली का त्योहार भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि संसार के चप्पे-चप्पे में यह महापर्व धूमधाम से मनाया जाता है। सिंगापुर में दीपावली के दिन सरकारी छुट्टी होती है। कई कार्यक्रम होते हैं। श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी, मारिशस, केन्या, तंजानिया, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, नीदरलैंड्स, कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका आदि देशों में दीपावली की रात अच्छी धूमधाम रहती है।
भारतीयों का का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है, झूठ का नाश होता है। उपनिषद के वाक्य हैं असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय। सत्य से असत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर। दीपावली के त्योहार का संदेश यही है। इस त्योहार का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह हिंदुओं की धार्मिक परंपरा का प्रतीक सर्वोच्च महत्व का त्योहार है। इसे कभी किसी तरह की राजनीति से नहीं जोड़ा गया है। मुगल काल में भी बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहां आदि के शासनकाल में भी दीपावली का त्योहार परंपरागत उत्साह से ही मनाया जाता था। मुगलकालीन किताब तुजुक-ए-जहांगीर के मुताबिक सन 1613 से लेकर 1626 तक जहांगीर ने अजमेर में दीपावली मनाई। मुगल शहंशाह ही नहीं, बंगाल और अवध के नवाब भी शाही अंदाज में दीपावली मनाते थे।
इस तरह दीपावली का त्योहार सर्वमान्य रूप से हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार है और इसको लेकर आज तक किसी तरह का राजनीतिक भेदभाव नहीं देखा गया। कभी किसी भी सम्राट, राजा, बादशाह या नवाब ने कभी भी किसी को दीपावली मनाने से नहीं रोका। उल्टे वे भी इस त्योहार में शामिल होने लगे। इस तरह दीपावली का त्योहार सनातन धर्मी हिंदुओं की आस्था का सबसे बड़ा प्रमाण भी है। हिंदुओं में वैचारिक आधार पर भले ही कितने ही भेदभाव हों, लेकिन सभी हिंदू दीपावली का त्योहार समान रूप से उत्साहपूर्वक मनाते हैं।
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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