तेरे ग़म का जो तलबगार नहीं हूँ शायद

मैं तेरी चाह तेरा प्यार नहीं हूँ शायद


घर के छोटे भी मुझे सीख दिया करते हैं

अपने अजदाद की दस्तार नहीं हूँ शायद


है मेरा एक ख़ुदा एक है दुनिया मेरी

मज़हबी खेल का व्यापार नहीं हूँ शायद


ये तो मुमकिन है मेरी राय अलग हो तुमसे

हाँ दिलों में उठी दीवार नहीं हूँ शायद


अपनी ग़ज़लों को लतीफ़ों के बराबर न रखा

वो जो बिक जाये वो फ़नकार नहीं हूँ शायद


वो जिन्हें मेरी ज़बां नर्म नज़र आती है

उनसे कह दो कि मैं अख़बार नहीं हूँ शायद


जुस्तजू के लिये हर दर पे ये सर झुक जाये

"दोस्तो ऐसा भी लाचार नहीं हूँ शायद"


कश्तियों को ये भरम क्यूँ है मेरे बारे में

देखो 'साहिल' हूँ मैं मँझधार नहीं हूँ शायद


लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)