उपलब्ध इतिहास और सामाजिक चरित्र  


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।

इस देश में कैसे क्या हुआ, पूरा इतिहास उपलब्ध है और उस पर तरह-तरह के शास्त्रार्थ होते रहते हैं। किस सन में किस राजा का शासन रहा। कौन चक्रवर्ती रहा। किसका राजवंश कब तक चला। उसके बाद किस राजवंश ने शासन किया। मौर्य वंश, गुप्त वंश, हूण वंश, शक आदि के बाद मुसलमानों के अलग-अलग वंश। फिर मुगल वंश। उसके बाद दो सदी तक अंग्रेजों का शासन। यह पूरा घटनाक्रम करीब डेढ़ हजार साल का है और यही काल विश्व में आधुनिक वैज्ञानिक विकास का भी है।

इस दौरान भारत में क्या हुआ? कई राजाओं में आपस में लड़ाई होती रही। कत्लेआम, लाशों के ढेर, महिलाओं का अपहरण आदि। इस माहौल में हमारा देश कहां से कहां पहुंचा? अब पूरी स्थिति सामने है। कभी वैष्णव मतावलंबियों और शिव के मतावलंबियों के बीच झगड़ा होता रहा। कभी विदेशी हमलावरों से भारत के राजा जूझते रहे। इस लड़ाई-झगड़े के बीच जो समाज का स्वरूप रहा, वह बड़ा विचित्र हो गया। आम जनता के पास जैसे-तैसे जिंदगी गुजारने के अलावा और कोई उपाय नहीं था। धर्म के प्रति उनकी आस्था बनी हुई थी। वह भी तमाम कथाओं और भजन-पूजन के रूप में। इधर राजा युद्ध लड़ते रहे। लोग जगह-जगह लोग देवी-देवताओं के भजन गाते हुए जीवन व्यतीत करते रहे।

चरित्र का हिसाब पूरी तरह बिगड़ा हुआ था, जिससे सबसे ज्यादा तकलीफ महिलाओं को हुई। महिलाओं के व्यक्तित्व का विकास ही नहीं हो पाया। खेती-किसानी, समाज का रहन सहन, जीविकोपार्जन के साधन, फसलों का उत्पादन और विक्रय, त्योहार मनाने की परंपरा आदि इत्यादि सामाजिक व्यवहार कैसा था, इसका उल्लेख इतिहास में ज्यादा नहीं है। बिटविन द लाइन (पंक्तियों के बीच) जो चीजें समझ में आती हैं, उससे यही अनुमान लगाया जा सकता है कि सामाजिक ढांचा तहस-नहस था और महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित थीं। कब किसको किसके घर की कोई सुंदर महिला पसंद आ जाए और वह उसे हासिल करने के लिेए क्या कर बैठे, इसका कोई हिसाब-किताब नहीं था। कोई कानून-कायदे नहीं थे। लोगों का जीवन असुरक्षित था और खास तौर से महिलाओं की इज्जत का कोई भरोसा नहीं होता था।

जब भी एक राजा दूसरे राज्य पर चढ़ाई करता था तो सैनिकों के निशाने पर महिलाएं विशेष रूप से होती थीं। इसी परेशानी में लोग बड़े बेचैन रहते थे और सुरक्षा के लिए वे अन्य धर्म में शरण लेने लगे थे। अगर भारत में बौद्ध धर्म और जैन धर्म का इस कदर विस्तार हुआ है तो इसका कारण यह भी है। हमलावरों के निशाने पर यहां के शिक्षा केंद्र रहे, यहां के विश्वविद्यालय रहे। यहां का सामाजिक जीवन उनके निशाने पर रहा। पिछले डेढ़ हजार साल में भारत में बहुत उथल-पुथल हुई। इसका विस्तार से वर्णन करने लगें तो वह कई जन्मों में भी संभव नहीं है। यहां के लोगों ने किस तरह जीवट के साथ जूझते हुए खुद को संभाले रखा है और आज भी अगर मुस्कुराते हुए गर्व से भरे हुए दिखते हैं तो उसके पीछे उनका स्वाभिमान और आत्मविश्वास ही है। भारत के लोगों ने हर तरह के जितने हमले सहन किए हैं, उतने अन्य किसी भी देश के लोगों ने सहन नहीं किए। यह भी भारत की एक खासियत ही है।

भारत में बुद्ध हुए, महावीर हुए और इन दोनों महात्माओं के उपदेशों से नया धर्म बन गया। उन धर्मों का इतिहास भी इस तरह रचा गया कि आज समझना मुश्किल है कि किसकी बात सही है। बौद्धों की, जैनों की, सनातन धर्मी हिंदुओं की या किसी अन्य मतावलंबी की। पश्चिम का वैज्ञानिक ज्ञान तर्क के आधार पर है। पूर्व का ज्ञान आस्था और विश्वास के आधार पर है। यह दुनिया आज जहां पहुंची हुई है, उसमें जितना पश्चिम का योगदान है, उतना ही पूर्व का भी है। इनमें भारत प्रमुख है। वेदों का ज्ञान तो यहीं से आया और दुनियाभर में फैला। बाद में वेदों के आधार पर ही अगर कई संप्रदाय बन गए तो यह अलग बात है। जड़ एक ही है। तना भी एक ही है। बाकी जो अन्य धर्म हैं, वे सब शाखाएं मात्र हैं। इसे कई महात्माओं ने अपने योग आधारित ज्ञान से साबित भी किया है।

शंकराचार्य हुए, रामकृष्ण परमहंस हुए, गुरुनानक हुए, महर्षि अरविंद हुए, स्वामी दयानंद सरस्वती हुए और भी कई महात्मा हुए, जिन्होंने समय-समय पर आत्मज्ञान का प्रकाश फैलाया। अब जिन ऋषियों ने वेदों की रचना की थी, उनके नाम से ब्राह्मणों के वंश ही रह गए हैं, जो अपनी वंशानुगत श्रेष्ठता के आधार पर अभी भी समाज को अपने हिसाब से चलाने का प्रयास करते रहते हैं। उन्हें स्वयं वेदों का कितना ज्ञान है, शायद वे भी नहीं जानते हैं। समय गुजरने के साथ ही वास्तविक ज्ञान और अंधविश्वास से परिपूर्ण कर्मकांडों का आपस में इतना घालमेल कर दिया गया है कि ज्यादातर लोग भ्रमित ही रहते हैं कि क्या सही है और क्या गलत।

किसी भी देश की, उसके समाज की तरक्की के लिए एक स्थायित्व की स्थिति आवश्यक है। अगर शासन में स्थिरता रहती है तो कई विकास कार्य संभव हो पाते हैं, लेकिन शासन ही स्थिर नहीं है और राजाओं का ज्यादातर समय एक-दूसरे से लड़ने में खर्च होता है तो विकास कार्य कैसे हो सकते हैं? भारत में स्थिर शासन की आधारशिला महाभारत के बाद पहली बार चाणक्य के दिमाग से रखी गई, जब चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने शासन का चौतरफा विस्तार किया। मौर्य वंश, गुप्त वंश, हूण वंश आदि के शासन काल में तमाम मंदिर बने। किले बने। सामाजिक संरचनाएं बनीं। भारत का सांस्कृतिक विकास हुआ। नृत्य, गायन आदि कलाओं का विकास हुआ। लेकिन इसके बाद कलिंग युद्ध में नरसंहार देखकर सम्राट अशोक ने जब धर्म ही बदल दिया, बौद्ध धर्म अपना लिया, बौद्ध धर्म के विस्तार के लिए राजकीय सहायता का क्रम शुरू हुआ तो इससे पूरी दुनिया में ठीक संदेश नहीं पहुंचा। बौद्ध के साथ ही जैन धर्म का विस्तार होने लगा था, जो अहिंसा पर आधारित था।

समझा जा सकता है कि दुनिया में जब खबर पहुंची होगी कि भारत के ज्यादातर लोग अहिंसा का पालन करने करने लगे हैं तो उन्होंने भारत पर हमले शुरू कर दिए। और वे हमले इस कदर हुए कि एक के बाद एक। भारतवर्ष में विदेशियों के हमलों की शुरूआत यूनानी योद्धाओं ने की थी, जब सिकंदर भारत में राज करने आ पहुंचा था। तब चाणक्य ने पूरे देश के एकीकरण की दिशा में प्रयास किए थे। उसके बाद हूणों के हमले हुए। मुसलमान आ गए। मुगल वंश का देश पर कब्जा हो गया। इस बीच समुद्री यातायात शुरू हो जाने के बाद पुर्तगाली आए। उन्होंने गोवा और मुंबई के इलाकों पर कब्जा किया। पुड्डूचेरी जैसे कुछ इलाकों पर फ्रांसीसियों का भी कब्जा रहा। अंग्रेजों ने पूरे देश को दो सौ साल तक अपने कब्जे में रखा।

कभी ये सरकार, कभी वो सरकार, कभी इसका शासन, कभी उसका शासन। इस तरह भारतीयों के जीवन में कई बदलाव हुए। विदेशियों के भारत में आने से यहां के रोजमर्रा के व्यवहार में कई नई चीजें जुड़ीं। जैसे आलू, टमाटर जैसी सब्जियां विदेशियों के साथ भारत में आ गईं। जिस चीनी को हम आज इस्तेमाल करते हैं, उसका आविष्कार पुर्तगालियों ने किया था। जो चाय आज भारत के सभी लोगों का नियमित पेय बन गई है, उसका चलन अंग्रेजों ने शुरू किया था। शुरू में पुराने परंपरावादी लोगों ने इसका विरोध भी किया, लेकिन वह टिक नहीं पाया और लोगों के जीवन में चाय ने अनिवार्य रूप से अपना स्थान बना लिया। बेकरी उत्पादों का चलन भारत में विदेशियों ने शुरू किया था। आज बिस्किट, डबलरोटी आदि से किसी को परहेज नहीं है।

भारत में मुसलमान राज करते रहे। इस दौरान बौद्ध धर्म भारत से निर्वासित हो गया, लेकिन जैन धर्म का अद्भुत विस्तार हुआ। अब वह अपनी पूरी परंपरागत व्यवस्था, लिखित, रचित पुराणों के आधार पर एक स्थायी धर्म का स्वरूप ले चुका है और जिस तरह का रहन-सहन और जीवन शैली जैनियों ने अपना रखी है, उसमें कोई भी जैन पहली नजर में देखने पर बिलकुल हिंदू की तरह ही दिखता है। जैन धर्म के अलावा और कोई धर्म ऐसा नहीं है, जो हिंदुओं के बीच में इस-तरह घुला मिला हो।

इसी तरह भारत के त्योहार हैं। होली, दीवाली, नवरात्रि जैसे त्योहार पंचांग की तिथियों के आधार पर मनाए जाते हैं, लेकिन वे क्यों मनाए जाते हैं, इसको लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपरागत कथाएं हैं। दीपावली का त्योहार लक्ष्मी पूजा का त्योहार है। कुछ धर्मावलंबी इसे राम के रावण को मारने के बाद अयोध्या लौटने के उपलक्ष्य में मनाते हैं। जैनी इस त्योहार को महावीर भगवान के निर्वाण दिवस के रूप में मनाते हैं। शारदीय नवरात्र का त्योहार बंगाल में सबसे बड़ा त्योहार है। वह इस उपलक्ष्य में मनाया जाता है कि इस मौके पर पार्वती दुर्गा अपने ससुराल से अपने पुत्रों गणेश और कार्तिकेय के साथ मायके आती है। नवरात्र के बाद उन्हें विदा किया जाता है। इसी परंपरा में दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और नवमी के बाद उनका विसर्जन किया जाता है। दुर्गा पूजा बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है। इस दौरान उत्तर भारत में रामलीलाओं का आयोजन होता है। इसी दौरान जैनियों के अलग त्योहार होते हैं।

इसी तरह गणेशोत्सव है। इसकी शुरूआत कभी लोकमान्य तिलक ने धार्मिक आधार पर अंग्रेजों के शासन का विरोध करने के लिए की थी। अब यह त्योहार महाराष्ट्र का सबसे बड़ा त्योहार है। यह त्योहार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता है। इन्हीं दिनों में जैनी लोग अपनी परंपरा और मान्यता के अनुसार अलग-अलग नाम से त्योहार मनाते हैं। इस तरह देश का धार्मिक वातावरण बहुत ही गड्ड-मड्ड है। कुछ भी स्पष्ट नहीं है। सवालों के ढेर हैं। जवाब देने वालों की कमी नहीं है। दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों की भरमार है। ऐसे में हिंदुत्व के नाम पर एक राजनीतिक ताकत बनाने की परिकल्पना एक सीमा तक तो लाभ पहुंचा सकती है, लेकिन उससे क्या भारत का हित हो सकता है?  

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)