हिंदुत्व की विचारधारा का प्रवाह

ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।

हम हिंदुत्व पर विचार कर रहे हैं। इसका उद्देश्य क्या है? स्वामी विवेकानंद ने भी हिंदुत्व का उद्घोष किया था। हिंदू धर्म को सनातन धर्म के समतुल्य बताते हुए विश्व के धर्म गुरुओं के सामने साबित किया था कि आध्यात्मिक ज्ञान में भारत किसी भी अन्य देश से पीछे नहीं है। उन्होंने 11 सितंबर 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में जो भाषण दिया था, वह आज भी न केवल हिंदू धर्म के संदर्भ में उल्लेखनीय है, बल्कि विश्व में उसे याद किया जाता है। उन्होंने प्रतिपादित किया था कि वेदांत दर्शन के आधार पर सनातन धर्म का उद्भव हुआ है और सारे सनातन धर्मी हिंदू हैं। उस समय पाकिस्तान, बांग्लादेश नहीं बने थे और न ही इनके अलग देश बनने की कोई कल्पना थी।

समझा जा सकता है कि विवेकानंद ने भारत भूमि के समाज की विभिन्न राजाओं के शासन में रहते हुए भी धार्मिक विचारधारा के आधार पर एकजुटता की बात कही थी। इससे आगे चलकर नए भारत को एकजुट करने में भी बहुत सहायता मिली। इस देश में धार्मिक आधार पर वाद-विवाद बहुत होते रहे हैं। वाद-विवाद का सिलसिला यहां तक पहुंचा हुआ था कि कालांतर में जैन और बौद्ध नाम से दो नए धर्म अस्तित्व में आ गए और उन्होंने धर्म की अपनी अलग शाखा का विस्तार किया। सनातन धर्म इतना श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग अन्य धर्मों की तरफ क्यों झुके? इस सवाल के जवाब खोजना कई लोगों के लिए बहुत तकलीफ भरा है। सनातन धर्म का कभी प्रचार नहीं हुआ। इसके अलावा बाकी जितने भी धर्म हैं, उनका सबका प्रचार करने में उस धर्म के अनुयायियों ने बहुत तन, मन, धन खर्च किया है। जो उन धर्मों के साधु-संन्यासी बन गए, उन्होंने तो अपना जीवन ही समर्पित कर दिया है।

सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए मनु स्मृति के आधार पर जिस समाज की रचना की गई, उसमें ब्राह्मणों और राजपूतों के निजी स्वार्थ का समावेश अधिक था। बाद में मनु स्मृति में उल्लेखित ज्ञान में भी लाभ-हानि और सुविधा के आधार पर फेरबदल कर दिया गया, जिससे धार्मिक आस्था भी सवालों के घेरे में आ गई। खास तौर से स्त्रियों के मामले में उनका आचरण और व्यवहार भेदभाव से भरा हुआ था। कई राजा कामुक होते थे। राजवंशों से आश्रय प्राप्त कर उनकी तारीफ में जुटे रहने वाले ब्राह्मण भी काम वासना से मुक्त नहीं थे। उस समय नीची जाति के लोगों की स्त्रियों की इज्जत खतरे में बनी रहती थी। हम समझ सकते हैं कि इसी प्रकोप से बचने के लिए कई लोगों ने अन्य धर्मों में शरण ली। अपने अन्य समाज गठित किए। दूसरी बात यह कि पूजा-पाठ, कर्मकांड, तंत्र-मंत्र आदि का भी समाज में जमकर प्रचार रहा है, चाहे वह हिंदू हों, बौद्ध हों या जैन हों। ये सारी बातें अंधविश्वास है, सिर्फ इतना कहने मात्र से बात खत्म नहीं होती है।

देश में इतने राजा और इतने राजवंश हो चुके हैं कि उनके वंशजों से पूरा भारत भरा-पड़ा है। जितने भी राजपूत नामधारी हैं, वे सभी किसी न किसी राजवंश से जुड़े हुए हैं। इसी तरह ब्राह्मण हैं। भारत भूमि में उपस्थित जितने ब्राह्मण है, किसी न किसी महान ऋषि से अपना वंश बताते हैं। वेदों में वर्णित जितने भी ऋषि हैं, सभी के वंश से ब्राह्मणों की उत्पत्ति है। इन दोनों जातियों के अलावा बाकी अन्य जातियों को इतने नीचे स्थान पर रख दिया गया है कि बाकी सभी हिंदू जातिवाद के आधार पर जबरदस्ती की हीन भावना के शिकार बने रहते हैं। एक तरफ हम कहते हैं सर्वे बंधु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया, वसुधैव कुटुंबकम आदि। दूसरी तरह सामाजिक व्यवहार में जातिगत आधार पर भयंकर भेदभाव दिखता है, जबकि आजकल कई लोग पढ़-लिख गए हैं, ब्राह्मणों से भी ज्यादा योग्य हो गए हैं। ऐसे में सदियों पुरानी जातीय श्रेष्ठता की डुगडुगी बजाते रहना ठीक नहीं है। लेकिन ऐसा हो रहा है तो इसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं।

ऐसी बात नहीं है कि सनातन धर्म एकदम से गया गुजरा है। यहां आत्मा-परमात्मा, अध्यात्म, मनुष्य का जीवन आदि पर जो अनुसंधान हुआ है और जो ज्ञान भारत के पास है, उसे पूरी दुनिया चमत्कार ही मानती है। सनातन धर्म कई बार खतरे में पड़ा तो उसके उद्धार के लिए अनेक साधु, संन्यासी, संत सामने आए। जब बौद्ध धर्म की मिथ्या धारणाओं का प्रचार ज्यादा होने लगा था, उस समय आदि शंकराचार्य सामने आए थे। शंकराचार्य का जन्म ईसवी सन 788 में केरल के कालपी या काषल गांव में शिवगुरु भट्ट और आर्यांबा के पुत्र के रूप में हुआ था। तीन वर्ष की आयु में उनके पिता का देहांत हो गया। छह वर्ष की उम्र में वह प्रकांड पंडित हो गए थे और आठ वर्ष की उम्र में उन्होंने संन्यास ले लिया था। उनका पूरा जीवन वैदिक सनातन धर्म को फिर से प्रतिष्ठित करने के प्रति समर्पित रहा। उन्होंने कई ग्रंथों की रचना की। शंकरभाष्य की रचना कर विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास भी किया। केदारनाथ के पास 32 वर्ष की अल्प आयु में उनका देहांत हो गया।

शंकराचार्य ने चार पीठ स्थापित की थी, ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ। शंकराचार्य बाद में शंकर के अवतार माने गए और इसी लिए उनका नाम शंकराचार्य पड़ा। उन्होंने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विशद और रोचक व्याख्या की है। इसके अलावा उन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मंडूक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदाकण्यक और छांदोग्योपनिषद पर भाष्य लिखा। उन्होंने वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर की ओर से संबोधित बताया और उसका पूरे भारत में प्रचार किया। वह जीवन भर चार्वाक, जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थ के माध्यम से निरस्त करने में लगे रहे और इसमें उन्हें सफलता भी मिली। शंकराचार्य के विचार आत्मा और परमात्मा की एकता पर आधारित है। उनके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। 

शंकराचार्य ने वेदों की व्याख्या करते हुए सनातन धर्म का महत्व प्रतिपादित किया था। उनके जीवन काल में जैन और बौद्ध धर्म का काफी विस्तार हो चुका था। जैन धर्म का साहित्य ही इतना विशाल हो चुका है कि वह हिंदुओं के सनातन धर्म के समानांतर ही है और हिंदुओं के समस्त देवी-देवताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए सिर्फ अपने ही तीर्थंकरों की ओर से श्रमण परंपरा के माध्यम से प्रवर्तित बताया जाता है। जैनियों के 24 तीर्थंकर बताए गए हैं, जिनमें से महावीर चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर हैं। पहले तीर्थंकर ऋषभदेव थे। हालांकि यह बात भी उतनी ही सही है कि जैन धर्म का उद्भव महावीर के बाद से शुरू होने के ऐतिहासिक तथ्य हैं। इसके बाद इस सीमा तक जैन साहित्य रचा गया है कि सनातन धर्मियों से जुड़ी रामायण और महाभारत की कथाएं भी प्रकारांतर से जैन साहित्य में जैन धर्म के अंतर्गत दर्ज कर ली गई हैं। अब जैन साहित्य सही है या सनातन धर्म से जुड़ा हिंदू साहित्य सही है, इसका निर्णय कौन कर सकता है?

जैन धर्म की मान्यता है कि भगवान से कण-कण स्वतंत्र है। इस सृष्टि का या किसी जीव का कोई कर्ताधर्ता नहीं है। सभी जीव अपने कर्मों का फल भोगते हैं। जैन दर्शन के भगवान न कर्ता हैं और न ही भोक्ता। जैन दर्शन में सृष्टिकर्ता को कोई स्थान नहीं दिया गया है। जैन धर्म में विभिन्न देवी-देवताओं की आराधना का विशेष महत्व नहीं है। जिन्हें जिनदेव, जिनेन्द्र या भीतराग भगवान कहा जाता है, उनकी ही आराधना का विशेष महत्व है। इन्हीं तीर्थंकरों का अनुसरण कर आत्मबोध, ज्ञान और तन-मन पर विजय पाने का प्रयास किया जाता है। सनातन धर्मी हिंदुओं की यह मान्यता नहीं है। उनकी धार्मिक आस्थाएं अलग हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं से जुड़ी हुई हैं और उनके आधार पर भी हिंदू कई भागों में, कई जातियों में बंटे हुए हैं।

यही कारण है कि कई लोग, जो जैन या बौद्ध बन गए हैं, वे भी सनातन धर्म से ही निकले हुए लोग हैं, लेकिन उनकी अलग विचारधाराएं बन गई हैं। व्यापार कर्म में जुटे कई लोग बड़ी संख्या में जैन बन गए हैं। ज्यादातर नीची जातियों में बौद्ध धर्म में जाने का रुझान पाया जाता है। ऐसा क्यों हुआ? इसके कारणों की पड़ताल करना कोई नहीं चाहता। यह सामाजिक उथल-पुथल से जुड़ा हुआ मामला है। वर्ना कोई भी अपना धर्म क्यों बदलना चाहता है? एक अलग धार्मिक संगठन बनाने की जरूरत तब पड़ती है, जब सुरक्षा की चिंता हो या आजीविका का प्रश्न सामने हो। कम से कम भारत में सनातन धर्म से अलग होकर जो अलग-अलग धर्म सामने आए हैं, उसके पीछे भी ये कारण ही सामने आएंगे। बौद्ध और जैन धर्म का विस्तार होने से पहले भी सनातन धर्म के अनुयायी कई भागों में बंटे हुए थे, इसमें कोई मतभेद नहीं है। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)