प्रवीण दत्ता की आवाज़ में। 



प्रवीण दत्ता की कलम से। 

जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के शिप्रापथ थाने के SHO महावीर सिंह राठौड़ ने जिस फर्जी कोरोना रिपोर्ट तैयार करने के मामले का भंडाफोड़ किया है वो आप सभी ने अख़बारों में पढ़ा होगा या अपने पसंदीदा न्यूज़ चैनल पर देखा होगा। चूँकि मामले में प्रतिष्ठित डॉ.बी.लाल लैब व एबी डायग्रोस्टिक(अभिषेक अस्पताल मानसरोवर स्थित) का नाम आया तो जन साधारण का चिंतित और आश्चर्यचकित होना बनता ही था।  ख़ास बात यह है कि पुलिस ने अभी तक इस मामले में सैम्पल कलेक्शन का काम करने वाले कर्मचारी अभिषेक शर्मा व निखिल आकड़ को ही गिरफ्तार किया है। आरोप है कि ये दोनों घर-घर जाकर सैम्पल लेकर कोरोना की रिपोर्ट बदलने का काम करते थे और लोगो से रूपये लेकर फर्जी कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट वॉट्सअप के ज़रिये भेजते थे। पुलिस के अनुसार अभिषेक  अपने सहयोगी निखिल को ये फर्जी रिपोर्ट भेजता था। इसके बाद निखिल लैब में जाकर पुरानी रिपोर्ट को गूगल पर ऑनलाइन एप्प के ज़रिये बदल देता था। तो अब पुलिस को अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए यह देखना चाहिए कि इतनी प्रतिष्ठित अखिल भारतीय स्तर की डाइग्नोस्टिक लैब में बिना मालिकों या जिम्मेदारों की जानकारी भला यह खेल चल कैसे रहा था?  

राजकाज के पास पिछले 15 दिन से ऐसी सूचनाएं आ रही थी कि लोग अपनी कोरोना टेस्ट रिपोर्ट में बदलाव करवाने का पैसा दे रहे हैं।  कोरोना पॉजिटिव व्यक्ति रुपये देकर खुद नेगेटिव दिखाकर सामान्य जीवन जी सकता है , यह बात आसानी से समझ में आती है।  लेकिन कोई व्यक्ति जिसे कोरोना हुआ ही ना हो और वो खुद को कोरोना पॉजिटिव दिखाए, ये खेल जरा और गहरा लगा। अब चूँकि राजकाज एक नया और सीमित संसाधनों वाला संस्थान है सो हम कोरोना काल में इस मामले की सबूत सहित तो इन्वेस्टीगेशन नहीं कर पाए लेकिन मैंने स्वयं अपने अनुभव और संपर्कों के ज़रिये यह मालूम किया कि आखिर फ़र्ज़ी कोरोना रिपोर्ट का पूरा खेल कैसे खेला जा रहा है। छुपते छुपाते लोगों ने हमें जो जानकारी दी वो आपको भी चौंका देगी।  

एक खेल का आधा भंडा फोड़ तो शिप्रा पथ पुलिस ने कर ही दिया है दूसरा खेल जरा और ऊंचे लेवल का है जिसमें बड़े बड़े खिलाड़ी शामिल हैं। आगे कुछ और उजागर करूँ या लिखूं उससे पहले इस बात से फिर आगाह कर दूँ कि जो कुछ आप अब पढ़ेंगे उसकी पुष्टि पुलिस या अन्य जांच एजेंसियों को करनी चाहिए और करनी होगी तभी हमारी बात प्रामाणिक हो पायेगी। 

तो साहब बात शुरू होती है 2020 की कोरोना की पहली लहर से।  शुरू में देश में कोरोना को लेकर हव्वा खड़ा हुआ, जो सही भी था।  लेकिन बाद में स्वास्थ्य सेवाओं में मजबूती के साथ लोगों में विश्वाश बहाल हो गया कि सावधानी और इलाज से कोरोना को भी हराया जा सकता है।  सरकारी जागरूकता अभियान ने यह लोगों के दिमाग में बैठा ही दिया था कि बचाव ही एक उपाय है।  इसी बीच इस आपदा को अवसर बनाया इंश्योरेंस कंपनियों ने।  उन्हौने कोरोना के डर को भुनाते हुए कोरोना की पॉलिसियां बेचनी शुरू कर दी। संभावित खर्चे के डर से लोगों ने धड़ाधड़ ये पॉलिसियां खरीद लीं।  यहाँ तक सब ठीक। 

खेल शुरू हुआ कोरोना की दूसरी लहर में जब कि लोगों ने रुपये देकर खुद को कोरोना पॉजिटिव साबित किया और फिर निजी अस्पतालों में खुद को भर्ती दिखाकर बाकायदा क्लेम उठाना शुरू किया। इस खेल को समझिये।  हींग लगे ना फिटकरी और रंग - माशा अल्लाह पूरा इंद्रधनुष।  आपदा में अवसर।  घर बैठे लॉक डाउन में कमाई।  निजी अस्पताल की भी - जिनको असल में कोई इलाज करना ही नहीं पड़ता था और कमीशन के पूरे पैसे मिल ही जाते थे। इलाज के नाम पर रेमसेडिवीर,ऑक्सीजन और भी ना जाने क्या क्या। इसकी कीमत चुकाई उन बेगुनाहों ने जिन्हे वक़्त पर ना तो अस्पताल में बेड मिला और ना ही तथकथित जीवन रक्षक इंजेक्शन। प्राइवेट अस्पतालों ने इस खेल को खूब जम कर खेला या शायद अब भी खेल ही रहें होंगे। सरकार ने कोविड के बेड आरक्षित रखने को कहा तो इन्होने फ़र्ज़ी मरीजों को दिखाकर बेड फुल दिखा दिए जबकि उन बिस्तरों पर नॉन कोविड बीमारियों के मरीज भर्ती थे और वे भी पैसा दे रहे थे।  आप समझ रहें हैं ना ? बिस्तर एक मरीज अनेक। 

और  इधर व्यापार और नौकरी से मार खाया व्यक्ति क्लेम के पैसों से कर्फ्यू में भी जश्न मना रहा था। प्राइवेट अस्पतालों में फर्जी क्लेम की कहानी नई नहीं है पर जरूरतमंद मरीजों की जान की कीमत पर यह खेल पहली बार हो रहा था। लगता है सभी ने प्रधानमंत्री के 'आपदा में अवसर' के मन्त्र को अपनी ही परिभाषा देनी शुरू कर दी थी जो कि गिद्ध संस्कृति से आई लगती है। आपने आज तक कहानी किस्सों में नरभक्षीयों के बारे में पढ़ा होगा।  अब जान लीजिये कि आप उन सफ़ेद पोश नरभक्षियों के बीच ही रहतें हैं।  

अब यह काम जांच एजेंसियों का है कि वे कोरोना वारियर की खाल में छिपे इन परजीवियों को ढूंढें।  अगर राजकाज की क्षमता होती और हालात थोड़े भी ठीक होते तो यह काम आधे से ज्यादा हम ही कर के देते। 

अंत में आगे की बात।  अभी सभी तरफ हाहाकार मचा हुआ है। इलाज, ऑक्सीजन की जद्दोजहद है  और अग्नि देने - दफनाने का दुष्कर और दुखद दृश्य है सो अभी आपका मीडिया आपको इंश्योरेंस कंपनियों के क्लेम सेटलमेंट की कहानियां नहीं बता रहा है।  थोड़े हालात सामान्य होने दीजिये, थोड़े विज्ञापन के द्वार खुलने दीजिये और फिर देखिये आपको कैसे ना सधने वाली बीमा कंपनियों के खिलाफ दायर मुकदमों की रिपोर्ट  आपके के ही अखबार में पढ़ने को मिल जायेगी।   

अपना और अपनों का ध्यान रखियेगा।  घर में ही रहें।  बाहर कोरोना के अलावा भी और शिकारी इंतज़ार में हैं।