प्रवीण दत्ता की आवाज़ में। 

प्रवीण दत्ता की कलम से। 

मैं यह जानता हूँ कि इस सम्पादकीय के लिए मुझे ठिकाने लगाया जा सकता है लेकिन हजारों को ठिकाने लगा चुके लोगों को सबके सामने लाना मेरी पत्रकारिका का फ़र्ज़ भी है और धर्म भी, सो लिख रहा हूँ। 

देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े न्यायविद जस्टिस एस ए बोबडे सेवानिवृत्त हो गए। आने वाले दिनों में वे भी किसी राज्य के राजयपाल या लेफ्टिनेंट गवर्नर बने दिख सकते हैं। देश में सेवाओं का पारितोषिक देने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही। तो  सवाल यह है कि बोबडे साहब ने ऐसी क्या उल्लेखनीय सेवाएं दी जिनके लिए उन्हें याद रखा जायेगा। निश्चित ही वे ' क्वालिफाइड ' रहे होंगे तभी वे जज बने और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की कुर्सी पर विराजमान हुए। अपने कार्यकाल में उनकी कलम ने हजारों-लाखों के भाग्य बदले होंगे और सभी का या बहुमत का भला ही हुआ होगा।  पर मेरी (जनता की) चिंता बोबडे साहब के कार्यकाल के आखिरी दिनीन को लेकर है।  यह वही काल था जब देश में कोरोना की दूसरी लहर अपनी प्रचंडता की तरफ अग्रसर थी और अमीर, गरीब, बुज़ुर्ग, बच्चे और नौजवान सभी इसकी चपेट में आते जा रहे थे। मजदूरों ने भयाक्रांत होकर अपने अपने राज्यों का रुख करना शुरू कर दिया था।  कोरोना के एक्टिव केस के मामले में भारत दूसरी पायदान पर पहुँच रहा था। पूरे 2020 में कोरोना से जूझने के बावजूद हमारा हैल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर हांफ रहा था।  इस सब के बीच हमारे शीर्ष नेता, खुद दूर मंच की सुरक्षा से, जनता को लाखों की संख्यां में एकत्रतित कर उन्हें सुपर स्प्रेडर बना रहे थे। इधर लाखों ने तय किया था कि वे गंगा में डुबकी लगाकर अपने आदर्श नेताओं की तरह का ही उदाहरण पेश करेंगे। जब कुम्भ से श्रद्धालु वापस अपने अपने राज्य पहुंचे वही हुआ जिसका डर था। कोरोना ने कहर बरपा दिया। लोग एक एक सांस को तरसने लगे, आवश्यक दवाओं की कालाबाजारी होने लगी और समाज का वीभत्स चेहरा हर चीज के महंगे दामों से उजागर हुआ। किसी की कही - श्मशान और कब्रिस्तान की बात हूबहू चरितार्थ हो रही थी, अंतिम संस्कार के लिए वेटिंग के दिल दहला देने वाले दृश्य देखने और सहने के लिए मजबूर किया जा रहा था। बिना पूरी दवाई, हर तरफ कड़ाई का माहौल था।  इस बीच फीका उत्सव मनाने के गाल बजाये गए।  टीके निर्यात करके जनता को फिर लाइन में लगा दिया गया। अस्पतालों में बिस्तर, दवा, इंजेक्शन और ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मच गया। 35 हजार करोड़ के प्रावधान के बावजूद नैनिहालों से वैक्सीन की कीमत वसूली की तैयारी हो गई। 

अब आप कहेंगे कि सही या गलत जैसा भी था,  ऊपर लिखा सब तो राजनीति के कारण हुआ इसमें जस्टिस बोबडे का क्या रोल? 

जब तमाम राज्यों ने अपने अपने हाई कोर्ट में कोरोना से समबन्धित अलग-अलग मुद्दों पर याचिकाएं लगाई तो जस्टिस बोबडे ने एक ही आदेश से यह तय कर दिया कि कोरोना सम्बन्धी सारे मामले एक ही जगह सुप्रीम कोर्ट सुनेगा। इतना ही नहीं।  न्यायधीश महोदय ने इसकी सुनवाई भी दो सप्ताह के लिए टाल दी। यानि अगले दो सप्ताह सरकार से कोई सवाल ना किया जाए क्योंकि सरकार 500- 500 लोगों को कोरोना की दीक्षा देकर वोट मांगने जाएगी।  आपने भागते चोर की लंगोटी सुनी होगी लेकिन मरते मुर्दे का कफ़न नहीं सुना होगा। 

बोबडे साहब, आपको आपके यशस्वी न्यायिक कैरियर की बहुत बहुत बधाई। याद रखियेगा कि अब आप किसी भी राज भवन की दीवारों के पीछे बैठ  जाइएगा लेकिन इस देश की अवाम की की आह और वाह उन दीवारों को भेद कर आप तक पहुंचेंगी। जनता नेताओं से जिस व्यवहार की अपेक्षा रखती है वैसी न्यायधीशों से नहीं। चलिए खैर आपको भी इतिहास में अमर होना था हो गए।  कहतें हैं ना बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा।