प्रदेश में कोरोना संक्रमित मरीजों की बढ़ती संख्या और इसके बीच रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी को लेकर राज्य सरकार ने इन सवालों का जवाब चिकित्सा विशेषज्ञों के हवाले से देते हुए शनिवार को पहली बार इसकी एडवाइजरी जारी की है। इसमें बताया गया है कि यह इंजेक्शन हर संक्रमित के लिए जरूरी नहीं है और यह जीवन रक्षक भी नहीं है। ये नहीं मिले तो बेवजह दौड़ भाग करने की आवश्यकता भी नहीं है।
S.m.s. मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ सुधीर भंडारी के अनुसार पहले सप्ताह में कोविड कम्वेलेशेन्ट प्लाज्मा वायरल दबाव कम करने के लिए मदद करता है। इसीलिए रेमडेसीविर कोविड-19 के इलाज का केवल एक हिस्सा है। इसकी उपयोगिता पहले 7 दिन के लिए ज्यादा होती है। जरूरत पड़ने पर उसे 10 दिन उपयोग में भी ले सकते हैं। यह इंजेक्शन एक एंटीवायरल ड्रग है और संक्रमण के शुरुआती दिनों में ही कारगर होता है। संक्रमण ज्यादा और फेफड़े खराब होने पर ही इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। हर कोरोना मरीज को इस इंजेक्शन की जरूरत नहीं होती। सामान्य लक्षणों पर मरीजों को यह इंजेक्शन नहीं लगाना चाहिए। भी घर पर ही आइसोलेशन और सही देखरेख में ठीक हो सकते हैं।
वे मरीज जिनमें गंभीर लक्षणों के साथ-साथ ऑक्सीजन लेवल की कमी पाई जाती है, उन्हें यह इंजेक्शन देना जरूरी होता है। आपको बता दें कि यदि मरीज को पहले सप्ताह में ऑक्सीजन स्तर कम यानी 90 से 91 होने के साथ-साथ 6 मिनिट चलने या 6 मिनिट वॉक टेस्ट से सिचुएशन चार से 5% घटता हो। तेज बुखार होता हो और फेफड़े में सीटी स्कोर 8 से अधिक हो। साइटोकाइन मारर्कस भी बढ़े हुए हो। लिंफोसाइट और पॉलीमोर्फ़ का अनुपात ज्यादा हो औऱ इसके साथ ही इओसिनोफिल्स 0% हो जो कि हाई वायरल इंफेक्शन को दिखाता है तो ऐसे में ही में रेमडेसिविर इंजेक्शन देना चाहिए।
ब्यूरो रिपोर्ट!


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