ब्यूरो रिपोर्ट!


पिछले कई दिनों से मीडिया में आ रही कोरोना महामारी की खबरों को देखकर अब जनता का एक बुद्धिजीवी वर्ग मीडिया को यह कहने लगा है कि बस बहुत हो गया। आप हमेशा महामारी को लेकर नकारात्मक खबरें प्रसारित करते हो। इस नेगेटिव अंदाज से की गई रिपोर्टिंग से समाज आहत होता है इसलिए नकारात्मक खबरें छोड़कर यह दिशा में किए जा रहे। सकारात्मक प्रयास बताएं। कहने का मतलब है कि मीडिया को लेकर अब आम जनता में विरोध के स्वर उभरने लगे हैं। राजकाज न्यूज़ आपकी इस राय से कुछ हद तक सहमत है। लेकिन हम आपसे या यूं कहें कि उस बुद्धिजीवी वर्ग से सिर्फ एक सवाल का जवाब चाहते हैं और वो ये है कि:---

                                                                      


क्या देश की जनता ने अब तक इस महामारी की भयावहता को समझ लिया है या सरकारों के बार-बार कहने के बावजूद आम जनता ने उस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं? क्या राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम जनता की इसमें खुद की भागीदारी नहीं है? इसका सबसे बड़ा जवाब और वह भी एक सवाल के रूप में है कि क्या चुनाव की रैली में हम को जबरदस्ती घर से बाहर निकालने के लिए बाध्य किया गया? हम को घर से पकड़ पकड़ कर बाहर निकाला गया और भीड़ के रूप में इकट्ठा किया गया। मान लीजिए भीड़ इकट्ठा करने के लिए किसी प्रकार का लालच भी दिया गया तो क्यों इस महामारी को भूल कर आम जनता नेताओं के दीदार और उनकी बातों को सुनने के लिए घरों से बाहर निकली? क्या कुंभ स्नान औऱ चुनाव रैली के दौरान हजारों- लाखो भीड़ में शामिल हुए हम लोग क्या  भूल गए थे कि जान है तो जहान है ? आखिरकार पिछले 1 साल में पारिवारिक- सामाजिक- धार्मिक और आर्थिक रूप से लगभग बर्बादी के कगार पर पहुंचने के बावजूद हमने कोरोना महामारी को उतनी गंभीरता से क्यों नहीं लिया जितना कि हमको लेना चाहिए था। और उसी का नतीजा है कि हालात अब दिन-ब-दिन बिगड़ते देख कर हम केंद्र और राज्य सरकारों को जी भर के कोस रहे हैं। सरकार ने ये नहीं किया- सरकार ने वो नहीं किया। सरकार सुनती नहीं है। कोई व्यवस्था नहीं है। सारे इंतजाम फेल है। ऐसी ही कुछ बातें आम जनता ही कर रही है। क्या सरकारों को इस तरह कोसना सही मायने में वाजिब है? देखा जाए तो पूरे विश्व में हाहाकार मचा चुकी इस महामारी को लेकर हम लोग खुद इतना गंभीर नहीं हुए जितना कि हमको होना चाहिए था।

                                                                       


 सरकार ने हमारे किसी सामाजिक समारोह में 100 लोगों की परमिशन दी तो हमने पंद्रह सौ को शामिल कर लिया। और अपने परिवार और समाज में भले ही वाहवाही लूटी हो, लेकिन दूसरी ओर हमारा यह कृत्य देश ही नहीं बल्कि मानवता के लिए खतरे की घंटी साबित हुआ है। आखिरकार सरकारों ने जनता की लापरवाही को ही ध्यान में रखते हुए दोबारा लॉकडाउन लगाने की राह पकड़ी है। जरा सोचिए आप की, हमारी और हम सब की घोर लापरवाही ने हमको एक बार फिर महाविनाश की दिशा में लाकर खड़ा कर दिया है। अब हमें मीडिया की नेगेटिव छवि को कोसने के बजाय गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि क्या वर्तमान हालात के लिए हम सब जिम्मेदार हैं। मीडिया अपना काम कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें अपना काम कर रही है तो हम क्यों नहीं अपना कर्तव्य निभा रहे?