ब्यूरो रिपोर्ट
देश की शीर्ष अदालत ने वर्तमान हालात पर पूरी तरह नजर रखते हुए समय-समय पर केंद्र को जरूरी निर्देश देना शुरू कर दिया है। इसी दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कोरोना से पैदा हुए संकट पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई करते हुए केंद्र के सामने सवालों की झड़ी लगा दी। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, एल एन राव और एस आर भट्ट की बेंच ने पूछा कि केंद्र, राज्यों और निजी अस्पतालों के लिए वैक्सीन की कीमत अलग-अलग क्यों रखी गई है? कोर्ट ने सरकार को राष्ट्रीय टीकाकरण मॉडल अपनाने के बारे में विचार करने का सुझाव भी दिया। यह कहा कि टीके का खर्च देश के तमाम गरीब लोग नहीं उठा सकते। जस्टिस भट्ट ने सरकार से पूछा कि वैक्सीन निर्माता 300 या ₹400 प्रति डोज कीमत लगा रहे हैं। एक राष्ट्र के रूप में हमें इसका अलग-अलग भुगतान क्यों करना चाहिए? कीमत के अंतर से यह राशि 30 से 40 हजार करोड़ रुपए की हो जाती है। जब हमने इसके लिए भुगतान किया है तो मूल्य अंतर का कोई मतलब ही नहीं है। उन्होंने केंद्र से कहा कि इस बाबत हम सरकार को निर्देश नहीं दे रहे मगर सरकार को गौर करना चाहिए। केंद्र सरकार सौ प्रतिशत वैक्सीन क्यों नहीं खरीद रही? शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि वर्तमान हालात को देखते हुए हॉस्पिटलाइजेशन की स्पष्ट राष्ट्रीय नीति क्या है? जो लोग इंटरनेट नहीं जानते या पढ़े लिखे नहीं हैं, उनके लिए वैक्सीन लगाने की क्या व्यवस्था है? शमशान कर्मियों के टीकाकरण की क्या योजना है? जरूरी दवाओं के लिए पेटेंट की क्या व्यवस्था है? यह कैसे सुनिश्चित होगा कि वैक्सीन को लेकर एक राज्य को दूसरे पर प्राथमिकता नहीं मिलेगी और जरूरी दवाओं का उत्पादन और वितरण सुनिश्चित क्यों नहीं हो पा रहा है?


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