धर्म निरपेक्षता, हिंदुत्व और आर्थिकी
भारत अपने ज्ञान के अलावा युद्धों के कारण भी प्रसिद्ध रहा है। आज हम हिंदुत्व की बात कर रहे हैं और हिंदुत्व के नाम पर राजनीतिक ताकत के रूप में संगठित हो रहे हैं। भारत के अंग्रेजी शासन से स्वतंत्र होकर दो देश बनने तक इस तरह हिंदुत्व नाम से कोई राजनीतिक ताकत नहीं बनी थी, जो अब बन गई है। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस की सरकार बनी तो उसने धर्म निरपेक्षता के आधार पर शासन किया। हिंदुत्व की उपेक्षा की। अल्पसंख्यकों को भरपूर प्रोत्साहन दिया और यह सिर्फ वोटों की राजनीति के लिए किया, क्योंकि सरकार पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए चुनाव में भाग लेना पड़ता है और जनता का बहुमत हासिल करना पड़ता है।
यह एक नियति की व्यवस्था थी। अब हिंदुत्व की प्रधानता हो गई है, लेकिन हिंदुत्व के नाम पर किन लोगों का वर्चस्व स्थापित हो रहा है? वर्चस्व आर्थिक ताकत से बनता है। देश के आर्थिक विकास में योगदान वे लोग देते हैं, जो व्यापार और कारोबार करते हैं। अधिकतर कारोबार की जिम्मेदारी वैश्य जातियों पर रही है। कुछ विधर्मी लोग भी अच्छा कारोबार करते हैं, जैसे मुसलमान, पारसी, सिख आदि। जैन स्वयं को विधर्मी नहीं मानते हैं और वे अलग धर्म का प्रचार करने के बावजूद हिंदुओं के साथ बने हुए हैं। इसी तरह सिख भी हिंदुओं से अलग नहीं हैं। मुसलमान और पारसी अलग हैं।
हिंदुओं में भारत के आर्थिक विकास में योगदान देने वाली प्रमुख जातियों में माहेश्वरी और अग्रवाल प्रमुख हैं। इसके अलावा खंडेलवाल, विजयवर्गीय आदि भी है। हालांकि विजयवर्गीय और अग्रवाल खुद को क्षत्रिय मानते हैं। माहेश्वरी वंश के प्रणेता भगवान महेश माने जाते हैं। महेश माहेश्वरियों के कुल देवता हैं। महेश के परिवार में देवी माहेश्वरी, उनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय हैं। माहेश्वरियों के धार्मिक स्थल का नाम महेश मंदिर होता है। माहेश्वरी उनकी कुलदेवी हैं। उनका अलग माहेश्वरी धर्म है। जन्म-मरण से मुक्त एक ईश्वर महेश में आस्था और मानव मात्र के कल्याण की भावना माहेश्वरी धर्म का प्रमुख सिद्धांत है।
माहेश्वरी समाज सत्य, प्रेम और न्याय के रास्ते पर चलता है। स्वयं को निरोगी रखना, उचित कर्म (मेहनत और ईमानदारी से) करना, बांट कर खाना और नाम जप तथा योग साधना माहेश्वरियों के जीवन के प्रमुख तत्व हैं। वे जहां कहीं भी निवास करते हैं, अपने धर्म का पालन निष्ठा के साथ करते हैं, वहां की स्थानीय संस्कृति का आदर करते हैं, यह माहेश्वरी समाज की विशेषता है। आज भारत के हर राज्य, हर शहर में माहेश्वरी बसे हुए हैं और व्यवहार कुशलता के कारण पहचाने जाते हैं। माहेश्वरियों के रीति-रिवाज में कुलदेवी माहेश्वरी की पूजा होती है। बिहार के मधुबनी जिले में काश्यप गोत्र धारी ब्राह्मण भी माहेश्वरी को कुलदेवी मानते हैं।
माहेश्वरियों का बोधवाक्य है सर्वे भवंति सुखिनः। यह वैदिक श्लोक का अंश है। माहेश्वरियों की कुलदेवियों के 82 स्थान हैं और उसी के आधार पर इतने ही गोत्र हैं। इनमें सोनी, सोमानी, जाखेटिया, सोढानी, कांकाणी, सारडा, गिलड़ा, जाजू, बाहेती, बजाज, कलंत्री, बिड़ला, कालाणी, झंवर, काबरा, डागा, गट्टानी, राठी, तोषनीवाल, भूतड़ा, मूंदड़ा, लड्ढा, भंसाली, मालपानी, लाहोटी, असावा, मानधन्या, तोतला, धूत आदि शामिल हैं। माहेश्वरी समाज ने वाणिज्य के माध्यम से हिंदू समाज में उल्लेखनीय स्थान बनाया है।
माहेश्वरी भारत में कई बड़े कारोबार चला रहे हैं, जिनकी वजह से असंख्य लोगों को रोजगार मिल रहा है। हिंदुओं के धार्मिक कार्यों में भी उनका बढ़-चढ़कर योगदान रहता है। समाज हित में वे कई संस्थाएं चला रहे हैं, जिनमें विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, तकनीकी संस्थान आदि प्रमुख हैं। माहेश्वरियों की तरह जैनियों ने भी इस तरह की कई संस्थाएं स्थापित कर रखी हैं, जिनसे कई लोगों को रोजगार मिलता है। इसी तरह अग्रवाल हैं। उनकी भी कई समाजेपयोगी संस्थाएं हैं।
अग्रवाल अग्रेयवंशी क्षत्रिय हैं। इस समाज की स्थापना महाराजा अग्रसेन ने की थी। इनकी प्रमुख गद्दी अग्रोहा है। यूनानी बादशाह सिकंदर के आक्रमण के बाद अग्रेय गणराज्य का पतन हो गया था। उसके बाद अग्रवाल पूरे देश में फैल गए और वाणिज्य को अपनी आजीविका का आधार बनाया। आज यह भारत का एक सफल उद्यमी समुदाय है। महालक्ष्मी इनकी कुलदेवी हैं। 18 गोत्र हैं, जिनमें गर्ग, गोयल, कंसल, बंसल, सिंहल, बिंदल, मित्तल, जिंदल, नागल, कुच्छल, भंदल, धारण, तायल, तिंगल, ऐरण, मधुकुल, मंगल शामिल हैं। ज्यादातर अग्रवाल आम तौर पर अग्रवाल उपनाम का ही प्रयोग करते हैं।
भारतीय समाज व्यवस्था में उद्योग, शिल्प और निम्न कोटि के कार्य शूद्रों के हिस्से में आते हैं। ये समाज में सेवा धर्म निभाते हैं। इनमें भी कई भेद हो गए हैं। सैकड़ों जातियां हैं। उनमें भी ऊंच-नीच बन गई है। शाकाहारी लोग ब्राह्मण और वैश्य समुदाय से जुड़ रहे हैं। मांसाहारी लोग क्षत्रिय वर्ग से जुड़ने के रास्ते पर हैं। सफाई जैसे निम्न स्तरीय कार्य करने वाली जातियां अलग रह गई हैं। उन्हें दलित कहा जाता है। देश आजाद होने के बाद इन दलितों की जातियों को अनुसूचित घोषित करते हुए आरक्षण दिया गया है। इसी तरह एक आदिवासी वर्ग अलग है। ये भारत के ही वनवासी हैं। इनकी भी कई जातियां हैं। अलग जातीय परंपराएं हैं। अलग रीति-रिवाज हैं। अलग-अलग देवी-देवता हैं। ये शेष प्रमुख हिंदू जातियों से अलग हैं। भारत सरकार ने इन्हें भी आरक्षण दिया है।
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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