प्रतापगढ़ से चंचल सनाढ्य की रिपोर्ट।
प्रतापगढ़। महिला सशक्तिकरण की बात तो सभी करते है, किंतु जब अधिकार देने की बात आती है तो अक्सर लोग अपने कदम पीछे खींच लेते है, लेकिन प्रतापगढ़ जिले के टांडा गांव के लबाना समाज में महिला सशक्तिकरण की अनूठी प्रथा देखने को मिलती है। यहां धुलण्डी के दो दिन बाद एक दिन के लिए महिलाओं को पूरी आजादी मिलती है और महिलाएं भी इस आजादी का पूरा फायदा उठाती है।
इस बार भी लठ्मार होली का आयोजन धमोत्तर के निकटवर्ती दुधली टाण्डा गांव मेें लबाना समाज में खेला गया। यह आयोजन सदियों से चलता आ रहा है। लठ्मार होली टाण्डा गांव के नायक मांगीलाल लबाना के खेत पर खेली गयी। इस होली में महिलाओं द्वारा पुरूषों पर लठ् बरसाऐ जाते हैं। पुरूष सहजता के साथ लठ् की मार को सहन करते हुए बचाव करते हैं। लठ्मार होली से पहले गांव के बीच में शाम ढ़लने से पुर्व विधी विधान पूर्वक पूजा, अर्चना के साथ पुरूष व महिलाओं द्वारा ललेनो नृत्य नगांरो के थपथपाहाट से शुरू किया। उसके बाद नायक के खेत पर ललेनो नृत्य के साथ लठ्मार होली खेली गयी।
स्थानीय भाषा में कहते है नेजा
मर्दों को पीटने के इस खतरनाक खेल को ग्रामवासी अपनी बोली में ‘नेजा’ या लठ्ठमार होली कहते है.। इस खेल में बडे-बुजुर्ग, युवा, महिलाएं सभी बडे उत्साह के साथ भाग लेते हैं । इस खेल में महिलाओं का पूरा वर्चस्व रहता है, पूरी दादागिरी रहती है. साल भर अपने पति, ससुर या जेठ के कठोर अनुशासन में रहने वाली ये गांव की भोली-भाली महिलाएं इस खेल का पूरा फायदा उठाती हैं औऱ जमकर अपनी पूरी भडास निकालती हैं । पति हो या पडोसी, युवा हो या बुजुर्ग, ससुर हो या जेठ, किसी को नहीं छोडती हैं। एक तरह से नेजा का दिन ग्रामीण-महिलाओं के लिए ‘महिला दिवस’ या आजादी के दिन से कम नहीं होता। महिलाओं को पूरी छूट रहती है, कोई भी उन्हें बुरा-भला नहीं कहता। उन्हें पूरी इज्जत दी जाती है। कोई भी महिलाओं से पिट कर उनके ऊपर हाथ नहीं उठाता है।
मुखिया देता है नेजा खेलने का निमन्त्रण
गांव का मुखिया ढिंढोरा पीटता है और गांव में सबको नेजा खेलने का निमन्त्रण दिया जाता है। शाम होते ही गांव में महिलाएं और पुरुष एक खुली जगह पर एकत्र हो जाते हैं। महिलाएं और पुरुष अलग-अलग टोलियों में नगाडे की थाप पर नाचते-गाते हैं और एक-दूसरे को छींटाकशी करते हैं। बीच मैदान में रेत से भरा एक बोरा और एक नगाडा रख दिया जाता है। महिलाएं हाथों में लचीली लेकिन मजबूत लकडिय़ां लहराते हुए पुरुषों को बोरा उठा ले जाने की खुली चुनौती देती हैं। पुरुष बोरा उठाने की कोशिश करते हैं और महिलाएं उनकी पूरी खबर लेती हैं. पीट-पीट कर बुरा हाल कर देती हैं। यह सिलसिला तब तक चलता रहता है, जब तक वे बोरा उठा ले जाने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो जाते, लेकिन तब तक कई पुरुष घायल हो जाते हैं और रात भर अपने घावों को सहलाते रहते हैं.
महिलाओं को सम्मान देने का पर्व
गावं के बुर्जगो के अनुसार पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं की समानता का दर्जा बना रहे इसके लिए बुर्जगों ने इस प्रकार के कार्यक्रम रखे थे। पुराने समय में पुरूष-प्रधान समाज में महिलाओं की हर जगह उपेक्षा की जाती थी। इससे महिलाओं में पुरूष समाज के प्रति उपजी कुंठा के भाव को दूर करने के लिए लट्ठमार होली का आयोजन हुआ। इसके माध्यम से महिलाओं की सालभर की कुंठाएं होली के पावन पर्व में खत्म होती हैं। इस दिन पुरूष खुशी-खुशी महिलाओं से मार खाकर उनकी सालभर की कुंठाओं और गिले शिकवों को दुर करते हैं। इस खेल को खेलने से पहले पूर्व भगवान शिव व पार्वती के सुखमय जीवन के गीतों का गायन किया जाता है। हमारी परंपराओं को देखते हुए तो यही लगता है कि हमारे समाज में महिला सशक्तिकरण पिछले कई वर्षों से या कहें कि सनातन काल से ही शुरू हो गया था लेकिन इसके मुखर होने में काफी समय लगा है।

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