संवादों से यही शिकायत
बातचीत से यही गिला है
मैंने तो चुप्पी मांगी थी
तुमने कोलाहल दे डाला
एक वक़्त था अद्भुत ऐसा
जब भाती थी आपाधापी
शोर जहाँ गुन्जन लगता था
मौन जहाँ लगता था पापी
सारी दुनिया वश में कर लूँ
यही तमन्ना थी इस दिल में
रोक-टोक करता था जो भी
मुझको लगता था संतापी
चलें मुझी से पूछ हवाऐं
घन बरसें मेरी मर्ज़ी से
इस ज़िद को पूरा करने में
मैंने सारा बल दे डाला
धीरे-धीरे समझ बढ़ी तो
गति में आया ज़रा सन्तुलन
देह-घड़ी पर हाथ-घड़ी ने
कसा बड़ी मुश्किल से बन्धन
खुले-खुले आँगन की मुझको
हवा लगी थी ज़रा सुहाने
और कैक्टस के गमलों पर
खुलते थे घर के वातायन
शैम्पेन का ले गिलास जब
सुनता था मनभावन ग़ज़लें
लगता था मन के मुर्दे को
मैंने गंगाजल दे डाला
अब तो बस ऐसा लगता है
पोर-पोर में थकन समाई
ख़त्म हुईं तन की जागीरें
लुप्त हुई मन की ठकुराई
कल तक जो कुछ सच लगता था
वही झूठ अब लगता मुझको
भागादौड़ी व्यर्थ गयी सब
आपाधापी काम न आई
आज सुबह ही ज़रा ग़ौर से
मैंने जब दर्पण देखा तो
लगा एक क़तरे के ज़िम्मे
पूरा दावानल दे डाला
©️✍ लोकेश कुमार सिंह '
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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