सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग  

ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।  

हिंदुओं में यह मान्यता स्थापित है कि चार युग थे। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग। इस युग का क्रमिक विवरण भी उपलब्ध है, जिसमें से सारा मिर्च-मसाला हटा दिया जाए तो उसके बाद यह विश्वसनीय प्रतीत होता है। हम मान सकते हैं कि ये बातें सही होंगी। सतयुग होगा। त्रेतायुग होगा और द्वापर भी होगा। अब कलियुग है। कलियुग के बारे में पहले से जो विवरण उपलब्ध है, उसमें इस समय जो वातावरण बना हुआ है, उसकी झलक पहले से मिलती है। जो लोग हिंदुओं को अंधविश्वासी मानते हैं और अपनी डेढ़ ईंट अलग से जोड़कर अपने अलग धार्मिक इतिहास की रचना करने का प्रयास कर रहे हैं, उसमें अब तक कोई सफलता नहीं मिल पाई है।

दो हजार साल पहले से जो इतिहास रचा जा रहा है, उसे विश्वसनीय माना जा सकता है, लेकिन उससे पहले विज्ञान के आधार पर कालक्रम की गणना करते हुए बहुत पहले से विकसित वेदों पर आधारित भारतीय संस्कृति के समयकाल को सिर्फ एक हजार साल के भीतर समेटने की जो चौतरफा कोशिशें हुई हैं, वे निस्संदेह हास्यास्पद और हिंदुओं के साथ मजाक है। कालक्रम की विश्वसनीय गणना के लिए वैज्ञानिक आधार पर एक अलग विषय क्रोनोलाजी बनाया गया है।

क्रोनोलाजी के तहत ईसा मसीह से पहले की कालगणना में ईसा पूर्व (बीसी अर्थात बिफोर क्राइस्ट) शब्द का इस्तेमाल होता है। इसके आधार पर चारों वेदों की रचना का समय ईसा पूर्व 900 से 1200 और उपनिषदों की रचना का समय ईसा पूर्व 700-800 के दौरान बताया गया है। बुद्ध का समयकाल ईसा पूर्व 483 से 563 वर्ष के दौरान बताया गया है और महावीर का समयकाल ईसा पूर्व 468 से 540 के दौरान बताया गया है। इसके अनुसार विश्व की पहली सभ्यता 3200 वर्ष ईसा पूर्व सुमेर वासियों ने स्थापित की थी। हड़प्पा सभ्यता वेदों की रचना से भी बहुत पहले ईसा पूर्व 2600-3000 साल पुरानी बताई गई है।

ईसा पूर्व 5000 साल से पांच लाख वर्षों तक तीन चरणों में पाषाण युग बताया गया है। इससे पहले प्रागैतिहासिक काल था। वैज्ञानिक आधार पर हुई इस कालगणना में राम रावण युद्ध और महाभारत का कोई उल्लेख नहीं है। इन्हें आज भी मिथक मात्र माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों से हिंदुत्व का बड़ा जोर है और लोगों को जंचाया जा रहा है कि जो विकास आज हो रहा है, वह भारत में बहुत पहले ही हो चुका है। मंत्री स्तर के नेता भाषणों में कहते रहते हैं कि टेस्ट ट्यूब बेबी का प्रयोग हमारे यहां महाभारत में हो चुका है। भारत के लोग विमान भी बना चुके थे और बहुत बड़े वैज्ञानिक थे। यह बात अलग है कि इतना वैज्ञानिक विकास होने के बावजूद यात्रा के लिए बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, ऊंटगाड़ी का ही प्रयोग होता था।

एक तरफ भारत के योगदान को लेकर हास्यास्पद दावे हैं और दूसरी तरफ पश्चिमी विचारधारा सहित अन्य धर्मावलंबियों की कालगणना में राम और कृष्ण की मौजूदगी को नकारा जा रहा है। राम के नाम से राजनीति हो रही है और हिंदुत्व के आधार चुनाव जीते जा रहे हैं। एक बार सरकार बन गई, दूसरी बार भी बन चुकी, लेकिन भारत सरकार की तरफ से यह स्पष्ट घोषणा अब तक नहीं हुई है कि धरती पर राम और कृष्ण की उपस्थिति पूरी तरह विश्वसनीय है और अब देश राम के आदर्श और कृष्ण के राजनीतिक सिद्धांतों के आधार पर चलेगा। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)