बहते-बहते बैठ गया जो पत्थर बन मेरे मन में

मैंने ऐसे हर आँसू को गीतों का संसार दे दिया


मुस्कानों में छुपा-छुपा कर जिसका सारा भेद रखा

लेकिन बदले में हाथों में जिसने केवल खेद रखा

जिसने सारी हदें लाँघ दीं धीरज की मर्यादा की

मैंने ऐसे हर आँसू को ये बिकता बाज़ार दे दिया


जो पलकों की तोड़ सलाखें खारा जल बन बह निकला

और हृदय की हिम को लेकर जो शोले सा दह निकला

जिसने सबके सम्मुख मेरा ही उपहास कराया है

ऐसे हर आँसू को मैंने छन्दों का उपहार दे दिया


जो मेरा न हुआ मैं उसका अब बोलो करता भी क्या

आम हुआ जो क़र्ज़ उसी की अब किस्तें भरता भी क्या

जिसने मेरे रोने को भी बोझ सरीखा कर डाला

ऐसे हर आँसू को मैंने हँसने का अधिकार दे दिया




©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)