युद्ध का वातावरण और सामाजिक जीवन  

ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।  

हिंदू संज्ञा करीब डेढ़ हजार साल पहले बनी। उससे पहले सनातन धर्म था। सनातम धर्म में विभिन्न देवी-देवताओं के आधार पर कट्टरता पैदा हुई। अलग-अलग संप्रदाय बने और उनमें तनाव पैदा हुआ। लड़ाई-झगड़े होने लगे। महाभारत के बाद भी यह सिलसिला नहीं थमने पर बुद्ध और महावीर के माध्यम से अहिंसा, संयम आदि के आधार पर नए धर्म बन गए। पहले बौद्ध धर्म बना, फिर जैन धर्म बना। जैन धर्म अहिंसा पर आधारित था, इसलिए समाज में अहिंसा का प्रचार हुआ। इससे पहले अकारण हिंसा का विरोध अवश्य था, लेकिन अहिंसा की कट्टर अवधारणा नहीं थी। महावीर ने साबित किया कि मनुष्य अहिंसा के आधार पर भी जीवित रह सकता है।

इसके बावजूद विभिन्न राजाओं के बीच युद्धों का सिलसिला जारी रहा। जो इतना बढ़ा कि यहां लोगों को युद्ध का नियमित प्रशिक्षण मिलने लगा। भारत बाहुबल प्रधान हो गया। चालाकी और छल-कपट से भरी नीतियों के आधार पर सत्ता पर नियंत्रण होने लगा। इस तरह कई राज्य बन गए थे। उस समय भी साधु-संन्यासी हुआ करते थे। उन्हें कोई परेशान नहीं करता था, क्योंकि सभी राजा सनातन धर्मी ही हुआ करते थे। अलग-अलग रीति-रिवाजों के कारण अलग-अलग जातीय समूह बनने से अलग-अलग राज्यों की शासन प्रणालियों में भिन्नता रही। साधु-संन्यासियों का सभी राज्यों में सम्मान होता था और तीर्थ यात्रा करने वालों को भी आवागमन में कोई रुकावट नहीं होती थी।

इस देश में पवित्र नदियों, पर्वतों की परिक्रमा करने की परंपरा है। भारत के विभिन्न भागों में जहां-तहां ईश्वर की उपस्थिति के प्रतीक के रूप में तीर्थ स्थल बने हुए हैं। देवियों के स्थान भी हैं और देवताओं के स्थान भी हैं। उन स्थानों पर बड़ी संख्या में भारतीयों का आवागमन सदियों से रहा है। ये तीर्थस्थल अब चीन में शामिल हो चुके मानसरोवर से लेकर सुदूर दक्षिण में कन्याकुमारी तक है। भारत के लोग दक्षिण से लेकर उत्तर में कराची से 150 किलोमीटर दूर हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में स्थित हिंगलाज माता के मंदिर तक पहुंच जाते हैं। पूरे देश में धरती पर महादेव की साक्षात उपस्थिति के प्रमाण के रूप में बारह ज्योतिर्लिंग हैं, जो भारत के दक्षिणी छोर से उत्तर में केदारनाथ तक जगह-जगह फैले हुए हैं। राम ने भी अपनी सेना लंका तक ले जाने के उद्देश्य से समुद्र पार करने के लिए पुल बनवाया था। राम ने पुल बनाने से पहले शिवलिंग की स्थापना की थी। उसके प्रतीक के रूप में रामेश्वरम तीर्थ है।

तीर्थ यात्रा के अलावा व्यापार के उद्देश्य से यात्रा करने वालों को भी असुविधा नहीं होती थी। काबुल के व्यापारी कोलकाता तक व्यापार करने पहुंच जाते थे। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने काबुलीवाला शीर्षक से एक मार्मिक कहानी भी लिखी है। इससे प्रमाणित होता है कि उस इलाके से कई लोग वहां उत्पन्न होने वाले फल आदि बेचने के लिए भारत में कहीं भी पहुंच जाते थे। समुद्री यातायात की सुविधाएं विकसित होने के बाद समुद्र पार के व्यापारी भी भारत पहुंचने लगे थे। कई विदेशी लोग ज्ञान की खोज में भटकते हुए भारत में आ जाते थे और यहां अपने देशों का ज्ञान अपने साथ लाते थे। इस तरह वैचारिक आदान-प्रदान का सिलसिला बना।

भारत में समुद्र पार के जिन लोगों ने यहां व्यापार किया, उनमें फ्रांस, पुर्तगाल और इंग्लैंड के लोग प्रमुख थे। अन्य देशों के लोग भी यहां व्यापार के लिए आते थे। भारत में अत्यंत उर्वर वातावरण हमेशा बना रहता है। यहां धन के अलावा और भी कई लाभ मिलते हैं। यहां के लोग कट्टर नहीं हैं। धर्मभीरु हैं। उनकी विचारधारा में सत्ता पर कब्जा करने वाली राजनीति का स्थान नहीं है। ऐसे लोगों पर सरलता से शासन किया जा सकता है। इसी आधार पर कुछ चालाक विदेशियों का भारत के अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग समय शासन रहा है।

भारत के कुछ हिस्सों पर यूनानी, पुर्तगाली और फ्रांसीसी भी शासन कर चुके हैं। इंग्लैंड के लोगों ने अपनी चतुराई भरी कूटनीति से पूरे भारत पर प्रशासनिक नियंत्रण कर लिया था। लेकिन इस अलग-अलग शासन की व्यवस्था में भी पूरे भूभाग की मूल आध्यात्मिक विचारधारा एक जैसी रही है। भारत में हिंदुओं के बीच आत्मा-परमात्मा, ईश्वर, मनुष्य का जन्म, विवाह, जीवन शैली और मरण एक जैसी आध्यात्मिक विचारधारा पर आधारित है।

यही सनातन विचारधारा है और हिंदुत्व की परिभाषा इसी आधार पर तय होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। सत्ता हासिल करने के प्रयास में हिंदुत्व को धर्म निरपेक्षता के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है, जबकि देश में बड़ी संख्या में लोग राजनीति को धर्म से अलग मानते हुए धर्म निरपेक्षता के आधार पर राजनीति करते हैं। क्या वे सभी हिंदुत्व के विरोधी हैं? 

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(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)