अब और क्या कहूँ मैं तुमको भी दिख रहा है

जो मर रहा है अब उस विश्वास को बचाओ


विकराल यह समय है हिम्मत निचोड़ पर है

रफ़्तार ज़िन्दगी की रुकने के मोड़ पर है 

माना कि हम हैं मानव लेकिन इसे जता कर

जग में मनुष्यता के आभास को बचाओ


संवेदना के प्रहरी कफ़नों में सो रहे हैं

आँसू भी बहते-बहते पत्थर से हो रहे हैं

घायल की गति को जानो पीड़ा का मोल समझो

अश्कों को ठहाकों के उपहास से बचाओ


अब भी नहीं जो सँभले तो कुछ नहीं रहेगा

धरती की हेटियों को अम्बर नहीं सहेगा

ख़ुद से भी कह रहा हूँ सबसे ही कह रहा हूँ

जो क्षीण हो रहा उस अहसास को बचाओ


 लोकेश कुमार सिंह 
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)