ब्यूरो रिपोर्ट!
आखिरकार वही हुआ जिसका अंदेशा प्रदेश के तमाम बुद्धिजीवी वर्ग को सता रहा था। गहलोत सरकार की ओर से किए गए तमाम समझाइश के प्रयास वास्तविकता के धरातल पर शून्य साबित हुए और जनता की दिन-ब-दिन बढ़ती गई लापरवाही के चलते कोरोना यमराज बनकर खड़ा हो गया। देखते ही देखते प्रदेश के निजी और सरकारी अस्पतालों के दरवाजे नए मरीजों के लिए बंद हो गए। ऑक्सीजन, इंजेक्शन और बैड की ऐसी मारामारी हुई कि कई मरीजों की सांसे इंतजाम होने की आस में ही टूट गई। अप्रैल में 10 दिन के दौरान ही मौतों का ग्राफ तेजी से बढ़ा और मंगलवार को तो इसने सैकड़ा पार करते हुए 121 मरीजों की जान ले ली। प्रदेश में अचानक बढ़ते गए मौतों के ग्राफ ने गहलोत सरकार की भी नींद उड़ा दी। आखिरकार अब तक जनता के पक्ष में खड़े रहते आए संवेदनशील मुख्यमंत्री को जनता के ही खिलाफ होकर सख्ती बढ़ाने के निर्देश देने पड़े। उन्होंने डीजीपी को स्पष्ट शब्दों में कहा कि जनता मान नहीं रही और अब उसे पुलिसिया अंदाज से ही समझाना होगा। चाहे इसके लिए कितनी ही सख्ती क्यों नहीं बरतनी पड़े?
आपको याद होगा कि अब तक तीसरी बार मुख्यमंत्री बन चुके गहलोत ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान राज्य कर्मचारियों की अपने कार्य के प्रति लापरवाही को लेकर सख्त मिजाज दिखाए थे। उन्होंने सरकार के खिलाफ की गई हड़ताल के दौरान अपने निर्णय के प्रति तटस्थ रहकर कर्मचारियों को ही झुकने पर मजबूर कर दिया था। हालांकि इस सख्त मिजाजी के चलते अगले चुनाव में उनको अपनी सरकार भी गंवानी पड़ी थी। लेकिन इसके बाद मुख्यमंत्री बनने पर गहलोत ने अपने सख्त तेवर बदल लिए। धीरे-धीरे जनता के प्रति अहम फैसले लेने वाले गहलोत को अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान प्रदेश में जननायक की उपाधि मिली। उसके बाद से ही गहलोत, कर्मचारी वर्ग और जनता के प्रति त्वरित और न्याय पूर्ण फैसले लेने की दिशा में अहम नेता के रूप में उभर कर सामने आए। वर्तमान में प्रदेश की राजनीति में गहलोत को एक अनुभवी और जनता के प्रति संवेदनशील मुख्यमंत्री के रूप में जाना जाता है। उनकी सादगी और जनता के प्रति समर्पण से ही लोग उन्हें प्रदेश का गांधी भी कहते है। ऐसे में जनता की लापरवाही ने ही संवेदनशील मुख्यमंत्री को ऐसा सख्त निर्णय लेने में मजबूर किया है। इस बात में कोई दो राय नहीं।


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