हिंसा का समर्थन करने वाला , दूसरे के धर्म को बुरा बताने वाला , "मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है" को नकारने वाला , दूसरे की ख़राब बात या काम के बदले उसी तरह की ख़राब बात या काम करने के लिये प्रेरित करने वाला , पढ़ा-लिखा हो कर भी असभ्य , अशिष्ट , अभद्र भाषा बोलने/लिखने वाला और जिनके सम्बन्ध में वो लिख/बोल रहा है उनके मुँह पर , उनके सामने अपनी बात रखने से कतराने वाला.
कोई दोगला , भीरू , मानसिक दिव्यांग जातिवादी तो हो सकता है लेकिन सच्चा और अच्छा सनातनी कभी नहीं हो सकता।
क्योंकि धर्म एक नितान्त व्यक्तिगत चीज़ है , एक से अधिक होते ही वह धर्म नहीं रहता पंथ या सम्प्रदाय हो जाता है। और एक सच्चा व अच्छा सनातनी कभी साम्प्रदायिक हो ही नहीं सकता।
✍️*लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'*
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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