24,280 वर्ग किलोमीटर में फैला 965 किलोमीटर लंबी अलास्का पर्वत माला के एक भाग को अपने में समाहित करता विश्व के आखिरी बचे कुछ महान बीहड़ों में से एक डेनाली राष्ट्रीय पार्क तीन संभागों में बंटा है। कोई 6.5 करोड़ साल पहले पहले दूहनाली पट्टिकाओं के टकराव से अलास्का पर्वत माला उभरी थी और आज भी यहां के एक दो पहाड़ ऊंचाइयों की तरफ बढ़ रहे हैं। आगे चलकर सहस्त्राब्दियों तक बर्फ की विशाल चट्टाने पर्वतों का मानमर्दन करके उनके शिखर पर स्थापित हो कर अपना साम्राज्य जमाती रही। भूगर्भ शास्त्रियों के अनुसार अलास्का के कितने ही ग्लेशियर्स अभी भी अज्ञात हैं जिन्हें ढूंढने में सदियां लग जाएंगी।


अमेरिका की सबसे बड़ी पर्वत चोटी माउंट मैक्किनले इसी बीहड़ में स्थित है जहां एक तरफ तो अभ्र के ढकी श्रृंग हैं तो दूसरी तरफ स्फटिक नीलाम्बर। इसके साथ ही यह बीहड़ कितने ही वन्य जीवन की शरणस्थली है। चरम तापमान में भी यहां कई पौधे अपनी जीवंतता को प्रदर्शित करते हुए 240 किलोमीटर प्रति घंटे की तीव्र गति से वेगवती कंपकपा देने वाली हवाओं का मुकाबला करते अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सफल होते दिखाई देते हैं। ज्योंहि तापमान में जरा बढ़ोतरी होती है तो कितने ही पुष्प खिलने लगते हैं। बीहड़ के नीचे वाले हिस्सों में तरह तरह के पेड़ भी पनपते देखे जाते हैं जबकि ऊपरी भागों में बियर बेरी रक्त प्रसूनों से पूरे परिदृश्य को ऐसा स्वरूप देती है कि मन आल्ह्यादित हो उठता है।

यहां पर जो जीव रहते हैं वे साहसी तो होते ही हैं, विकट परिस्थितियां उन्हें तगड़ा भी बना देती हैं। कारीबाऊ, डाल भेड़ें , विशालकाय मूस हिरण आदि बसंत के आसपास टुंडरा की नवागंतुक पत्तियों को चरते नजर आते हैं। हालांकि इनकी संख्या सीमित है पर परंतु शिकारियों की अनुपस्थिति और मानवीय अनाक्रमण की वजह से ये बेधड़क घूमते रहते हैं। कुछ तरह के पक्षी तो यहां के स्थाई निवासी हैं और कुछ बड़े बाज मौसम के अनुसार आते हैं जिनको छोटे जानवरों पर हमला कर उन्हे हवा में उठाते देखा जा सकता है। उभयचर वर्ग में यहां सिर्फ एक बहुत छोटा सा मेंढक रहता है जिसका शरीर सर्दी आने के साथ ही जमने लगता है। पुरानी पत्तियों के ढेर के नीचे यह मेंढक छह महीने मृतप्राय सा पड़ा रहता है और अपने लिवर में इकट्ठे किए ग्लूकोज मात्र से जीवित रहता है। ज्यों ही बसंत का आगमन होता है इसका शरीर सक्रिय हो कर छोटे कीट का शिकार करने लगता है।

शिकारी वर्ग में यहां भूरे भेड़िए होते हैं जो कारीबाऊ, मूस, खरगोश आदि का शिकार करते हैं। ग्रीजली भालू इन क्षैत्रों में अकेला विचरण करता नजर आ जाता है जो मुख्यतया बेरियां और पत्तियां खाता है। 500 किलो से भी अधिक परंतु घोड़े जैसे रफ्तार से दौड़ने में सक्षम यह भालू प्रोटीन के लिए नदी नालों से साल्मन मछली को ठूंस कर खाता है ताकि भयानक सर्दियों में अपनी मांद में पड़ा अपने लिवर में इकट्ठी की गई कैलोरीज़ से छह महीने स्वयं को जिंदा रख सके। यूरोप वासियों के अमेरिका आने से पहले यहां के मूल बाशिंदे बसंत के आसपास सोना ढूंढने और शिकार करने इन जगहों पर आया करते थे। आज भी कुछ सुरक्षित इलाकों में एक निर्धारित मात्रा में शिकार करने की इजाजत इन लोगों को मिली हुई है।