हमारे खुले घर हुआ करते थे और उन घरों में कई तरह की चिड़ियां हुआ करतीं थीं। हम लोग कभी ध्यान ही नहीं देते थे कि ये चिड़ियां हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण होती हैं। चिड़ियों के महत्व का पता दुनिया को चीन के तानाशाह नेता माओ त्से तुंग के 1958 के एक मूर्खतापूर्ण निर्णय के बाद चला जिसमें उसने कहा कि चूंकि चिड़िया अन्न के दाने खा जाती हैं तो यदि सभी चिड़ियां मार दी जाएं तो अनाज की बड़ी बचत होगी। हर एकाधिकारवादी नेता के पीछे मूढ़ अंध भक्तों की भीड़ होती है तो चीन में भी लोग लाठी, पत्थर, डंडे आदि ले कर घरों से निकल पड़े और सात से दस करोड़ के बीच चिड़ियां मार डाली, उनके अंडे पका कर खा गए।
इसका परिणाम दो साल बाद सामने आया जब जमीन के कीड़ों ने फसलें चौपट कर दी, टिड्डी दल जिनको चिड़ियां खा जाती थी चारों तरफ मंडराने लगे। परिणाम स्वरूप चीन में भयंकर अकाल की श्रृंखला चली जिसमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक करोड़ चालीस लाख लोग भूख से मरे। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार भूखे से मरने वालों की संख्या चार करोड़ से थोड़ी ही कम थी। यह विश्व की आज तक की सबसे भयानक मानव निर्मित पर्यावरण संबंधी दुर्घटना थी। कई विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों में उफान ले रहे विद्रोह  को दबाने के लिए ही माओ और उसके चाटुकारों ने 1962 में भारत पर हमला किया था ताकि जनता का ध्यान भूख से हो रही मौतों के तरफ से हटाया जा सके।

यह उदाहरण बताता है कि धरती पर हर जीव का अपना महत्व होता है, वह किसी उद्देश्य के लिए प्रकृति द्वारा निर्मित हुआ है इसलिए किसी भी जीव, घास, पौधे या पेड़ का समूल विनाश एक दिन मनुष्य स्वयं के विनाश का कारण बन सकता है। ऐसी ही एक चिड़िया का यूरोप में तो नाम है राइनेक यानि टेढ़ी गर्दन पर भारत में इस राम चिरैया का एक रूप कहा जाता है। असल में यह चिड़िया जब कोई खतरा महसूस करती है तो अपनी अपनी गर्दन को सांप की तरह अकड़ा कर 180 डिग्री तक घुमा लेती है और उसी की तरह फुफकारती भी है। यह कठफोड़वा ( वुड पैकर ) प्रजाति की चिड़िया है जो अधिकतर पेड़ों में बने चींटियों के घरों को फोड़ कर उनको अपना भोजन बनाती है। इसके लिए ये अपने छोटी परंतु तीखी और मजबूत चोंच को उपयोग में लेती है। इस तरह से यह पेड़ों में चींटियों की संख्या को नियंत्रित करती है वरना वे पेड़ के तने को खोखला कर देंगी। चींटियों के अलावा राम चिरैया फसलों को नुकसान करनेवाले छोटे बीटल, अफीद आदि कीड़ों को भी खाती है। इस तरह से यह चिड़िया किसान मित्र है।

यह चिड़िया पृथ्वी के अंदरूनी भागों में रहना पसंद करती है। यह एक घुमंतू पक्षी है। जब यूरोप में मौसम अच्छा होता है तो यह ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस , जर्मनी, रूस आदि देशों में रहती है। ज्योंहि यूरोप में सर्दी होने लगती है तो यह लंबी यात्रा करके मेडिटेरेनियन, मध्य पूर्व के देशों, भारत और एशिया के अन्य देशों एवम् सहारा पार के अफ्रीकी देशों में चली जाती है। प्रजनन के मौसम में अपने संभावित साथी को रिझाने के लिए ये गीत गाती हैं और पंख  फुला लेती हैं और ज्यों ही इनका पेयर बन जाता तो दोनों एक दूसरे को खाना खिलाने लग जाते हैं। नवजात बच्चों को नर और मादा दोनों मिलकर भोजन देते हैं। बच्चे जन्म के एक महीने बाद स्वतंत्र हो जाते हैं।

राइनेक का रंग पेड़ों की छाल जैसा होने से इनको छुपने में मदद करता है। यह चिड़िया हालांकि पूरी धरती पर तो खतरे में नहीं है परंतु यूरोप में इसकी संख्या में तीव्र कमी नजर आ रही है। पश्चिमी यूरोप के देशों में इसकी संख्या में गिरावट स्पष्ट नजर आती है। बेल्जियम इसका एक उदाहरण है जहां 1951 में इस चिड़िया के 175 जोड़े हुआ करते थे जो 1970 के दशकों में घट कर 35 रह गए। 1990 के बाद वहां मात्र पांच छह जोड़े नजर आ रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण पेस्टीसाइड्स का उपयोग है। कीड़े मकोड़े मरने से इस चिड़िया का प्राकृतिक भोजन समाप्त हो गया। ऊपर से वातावरण में परिवर्तन और हर जगह मनुष्य की दखलंदाजी से भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। आज इस सुंदर घुमंतू चिड़िया की संख्या में कमी आई है तो आने वाले समय में यह विलुप्त भी हो सकती है क्योंकि इनकी संख्या में यदि गिरावट आती है तो फिर बहुत तीव्र गति से ही आती है।