प्रधान संपादक प्रवीण दत्ता की कलम से।
एआईसीसी प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने प्रदेश कांग्रेस में मचे घमासान पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। रंधावा ने कहा पार्टी के बड़े फैसले कभी जल्दबाजी में नहीं लिए जाते। ऐसे निर्णय लेते वक़्त प्रदेश से लेकर आलाकमान तक विचार किया जाता है। उन्होने कहा वे राज्य के नेताओं के संपर्क में हैं और जल्द ही पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से बात करेंगे। रंधावा इससे पहले पायलट के सीधे अनशन पर बैठने को गलत बता चुके हैं।
दूसरी तरफ कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रचार प्रभारी जयराम रमेश तथा मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा भी गहलोत का समर्थन कर चुके हैं। कुल मिलाकर पायलट के धरने से सिवाय मीडिया चर्चा के कोई और जलजला आता नजर नहीं आ रहा। रंधावा ने आज अपने बयान में एक महत्त्वपूर्ण बात कही। उन्होने कहा कि पार्टी राजस्थान में पंजाब की गलती नहीं दोहराएगी यानि चुनावी साल में सीएम बदलने की कवायद राजस्थान में नहीं होगी। अब इस मुद्दे पर सिर्फ पार्टी अध्यक्ष खरगे का औपचारिक बयान सामने आना बाकी है। वो भी यदि आज-कल में ना आया तो इसका स्पष्ट मतलब होगा कि उन्होने चुप रहकर गहलोत को मौन समर्थन दे दिया है।
तो अब गेंद पायलट के पाले में ही है। सबकी नजर इस बात पर है कि उनका अगला कदम क्या होगा ? भाजपा में जाना तो बिन बुलाए मेहमान वाली स्थिति होगा जहाँ उन्हें सीएम की कुर्सी तो कतई ऑफर नहीं होगी। डिप्टी सीएम तो पायलट चुप रहकर कांग्रेस की सरकार रिपीट होने पर इज्जत के साथ बन सकते हैं। दूसरा रास्ता है आम आदमी पार्टी में शामिल हो जाएं। लेकिन पायलट भी जानते हैं कि उनका कितना जनाधार है सो केवल उनके नाम और केजरीवाल मॉडल सरकार के नाम और दाम पर राजस्थान में आम आदमी पार्टी की सरकार बनना बहुत मुश्किल है। केजरीवाल मॉडल की नितियों से गहलोत सरकार की लोकप्रिय नीतियां किसी भी दिन मुकाबला कर लेंगी। दूसरे रास्ते से तीसरा रास्ता निकालता है। पायलट आप का सीम फेस बनें और हनुमान बेनीवाल की पार्टी से गठजोड़ करें। लेकिन बात सिर्फ यह करने से नहीं बनेगी। अब यदि भाजपा वसुंधरा को सीएम फेस नहीं बनाती या चुनाव में महत्त्व नहीं देती तो पायलट भाजपा के वसुंधरा से असंतुष्ट खेमे से हाथ मिलाएं और जीत की राह प्रशस्त करें। इस रास्ते में अड़चन यह होगी कि भाजपा में फैसले मोदी और शाह ही लेंगे सो पायलट को गजेंद्र सिंह को साध कर मोदी-शाह को साधना होगा। यह एकमात्र रास्ता है जिससे पायलट अपना सीएम बनने का सपना पूरा कर सकते हैं। सवाल ये है गजेंद्र अपनी संभावित गद्दी भला क्यों पायलट को सौंपेंगे ? ऐसा उसी स्थिति में होगा जब भाजपा को साफ़ नजर आए कि वो अपने बलबूते राजस्थान में सरकार नहीं बना पाएगी।
अब वो सवाल जो मैंने हैडलाइन में ही उठाया है। आखिर क्या वजह है कि पायलट द्वारा अनशन जैसी पार्टी विरोधी कार्यवाही के बाद भी सीएम गहलोत ने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। निक्कमा या नालायक छोड़िए बल्कि इस मामले को टालते हुए चतुराई से लेफ्ट और राइट समझाने लगे। मेरे सूत्र बताते हैं कि गहलोत को उनके नजदीकी लोगों ने उनके निक्कमा - नालायक जैसे बयानों पर कोई अच्छा फीडबैक नहीं दिया है। इन सूत्रों के अनुसार अपने इस कार्यकाल में गहलोत अपनी दो ही गलतियों पर अफ़सोस करते हैं। पहली पायलट को गुस्से में निक्कमा-नालायक कहा क्योंकि यह उनकी छवि से मेल नहीं खाता और इन शब्दों की जगह दूसरे शब्द भी यही काम कर सकते थे लेकिन वे गरिमा भी बनाए रखते।
दूसरी गलती जो गहलोत को सालती है वो है संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल के घर चला स्तीफा प्रकरण का घटनाक्रम जिसके लिए गहलोत को आलाकमान से और सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगनी पड़ी। दरअसल शुरू से गांधीवादी विचारधारा के साथ पार्टी के लिए डटे रहने वाले गहलोत ने खुद भी कभी ऐसी कल्पना नहीं की थी। बहरहाल इस बार वे हर कदन सोच समझ कर उठा रहे हैं। उनकी स्पष्ट मंशा है कि वे चौथी बार राजस्थान के सीएम बनें और 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी का तन, मन और बहुत सारे धन से साथ दें। केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में वे अपनी मर्जी से सीएम पद त्याग कर राहुल की केंद्रीय टीम में शामिल हो जाएंगे। तब अगर उनके बाद सचिन सीएम बनें तो कोई ख़ास बात नहीं। लेकिन इस बीच कांग्रेस के केंद्रीय मीडिया विंग के नेताओं के गहलोत के पक्ष में बयान आने के बाद पायलट विचलित हुए और उनका धैर्य जवाब दे गया। वे इस बात से चिंतित थे कि आलाकमान राजस्थान और पंजाब की तुलना कर रहा है और पलड़ा गहलोत के पक्ष में झुक रहा है। कहतें हैं दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक कर पीता है तो आखिर किसकी शह पर पायलट ने ये अनशन कर धमकाने की नीति अपनाई ?
यह तो असंभव है कि उन्हें लगा हो कि वे अनशन पर बैठेंगे और गहलोत घबरा कर गद्दी उन्हें सौंप देंगे। यह भी असंभव है कि गाँधी परिवार में से कोई राजस्थान की बनी बनाई बिसात को बिगाड़ने की कोई चेष्टा करेंगे। पायलट अपने समर्थक विधायकों के कहने पर ऐसा करें यह भी बहुत दूर की कौड़ी है। अब इसका एक ही मतलब निकलता है जो मेरा कोरा कयास है। जैसे ही केंद्रीय भाजपा आलाकमान को आम आदमी पार्टी और हनुमान बेनीवाल के पायलट पर डोरे डालने के समाचार मिले उन्होने पायलट को यह सन्देश भिजवाया कि अगर वे गहलोत के खिलाफ आक्रामक मुद्रा अपना लें और वो भी वसुंधरा के मुद्दे पर तो भविष्य में वे लोग साथ आ सकते हैं। मत भूलियेगा कि आज ही पीएम ने वंदे भारत ट्रेन को रवाना करने के कार्यक्रम में क्या कहा। मोदी ने कहा वे गहलोत को धन्यवाद देते हैं कि बावजूद प्रदेश में राजनीतिक संकट होने के वे कार्यक्रम में आए। अब सवाल यह है कि कौन सा राजनीतिक संकट ? पायलट के अनशन से गहलोत सरकार गिर तो रही नहीं है फिर कैसा राजनीतिक संकट ? क्या प्रधानमंत्री मोदी का इशारा उस राजनीतिक संकट की तरफ था जो उनके चाणक्य ने विधानसभा चुनावों के लिए तैयार किया है ? बहरहाल राजनीतिक जंगल के कुछ जीव अपना घाव ठीक हो जाने के बाद भी उस पर जीभ फेरकर खुद को उस चोट की याद दिलाते रहते हैं।
कौन हैं वे राजनीतिक जंगल के जीव ? बूझो तो जानूं।







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