जयपुर ब्यूरो रिपोर्ट।   

राइट टू हेल्थ बिल को लेकर चल रहे विरोध का सबसे बड़ा कारण डॉक्टर्स और सरकार के बीच बिल में हुए समझौते में बदलाव माना जा रहा है। डॉक्टर्स से वार्ता के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मौके पर ही मुख्य सचिव ऊषा शर्मा, फाइनेंस सेक्रेट्री अखिल अरोड़ा और हेल्थ सेक्रेट्री पृथ्वीराज को बिल में जरूरी संशोधन करने के लिए कहा। इसके बाद बिल में संशोधन हुए और आईएमए सहित अन्य विभिन्न मेडिकल संगठन और डॉक्टर्स सहमत हो गए थे। फिर तीन दिन बाद ही एक बार फिर से सभी डॉक्टर्स बिल के विरोध में एकजुट हो गए।

सामने आया कि मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद अधिकारियों के नेतृत्व में जिन बिंदुओं पर सहमति बनी, उनमें से काफी को बदल दिया गया और सरकार के समक्ष रख दिया। यहां तक कि इस संशोधित रूप से रखे गए बिल के बारे में सरकार को यह भी बताया गया कि यह वही बिल है, जिस पर डॉक्टर्स ने सहमति बनी है, जबकि ऐसा नहीं होना सामने आया है।

सीएम से वार्ता के बाद 11 मार्च काे डॉक्टर्स ने दी थी सहमति... इन बिंदुओं पर असहमति होना आया सामने

  • बिल में 50 बेड से कम संख्या वाले अस्पतालों को शामिल नहीं किया जाए।
  • चिरंजीवी योजना में निजी अस्पताल डिलीवरी (नार्मल या सर्जरी) नहीं करा सकता, लेकिन इमरजेंसी में इलाज करना जरूरी होगा। डॉक्टर्स की मांग है कि योजना में निजी अस्पताल शामिल नहीं हैं तो इन्हें इमरजेंसी में क्यों शामिल किया जाए?
  • अस्पतालों की शिकायतों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम होना चाहिए, ताकि एक ही जगह इनका निवारण किया जा सके।
  • 23 फरवरी को सीएम से वार्ता हुई, उन्होंने आश्वासन दिया कि सब सही होगा।
  • 11 मार्च को आला अधिकारियों के बीच हुई वार्ता के बाद बिल में जरूरी बदलाव करने पर सहमति बनी। इसके बाद डॉक्टर्स ने बिल पर सहमति दे दी। हालांकि डॉक्टर्स का एक गुट सहमत नहीं था आैर बिल लागू नहीं किए जाने पर अड़ा था।
  • 12 मार्च की रात डॉक्टर्स को सूचना मिली कि बिल में किए जाने वाले संशोधन बदल दिए हैं। डॉक्टर्स ने बंद और सरकारी योजनाओं में बहिष्कार की चेतावनी दे दी।
  • 13 मार्च को डॉक्टर्स ने चेतावनी दी कि यदि बिल लाया जाता है तो 18 मार्च से सभी निजी अस्पताल बंद रखे जाएंगे।
  • 18 मार्च से विरोध बढ़ता गया और 20 को लाठीचार्ज के बाद न केवल सभी निजी अस्पताल बंद हैं, बल्कि सरकारी डॉक्टर्स भी विरोध में आ गए। मंगलवार को सरकारी अस्पतालों में भी कहीं काली पटटी बांधकर तो कहीं दो घंटे कार्य बहिष्कार किया गया।

हमनें डॉक्टर्स की सभी मांगें मान ली थी, बिल में किसी प्रकार की अड़चन नहीं है। बिल आमजन के लिए हैं और डॉक्टर्स भी आमजन हैं। ऐसे में उन्हें साथ देना ही चाहिए। जांच कमेटी में प्रधान या अन्य जन नहीं होने सहित अन्य प्रमुख मांगें मान ली गई हैं। -परसादी मीणा, चिकित्सा मंत्री

मुख्यमंत्री से वार्ता के बाद सहमति बन गई थी, लेकिन कुछ अधिकारियों ने गुमराह किया। राइट टू हेल्थ बिल में जो संशोधन होने थे वे नहीं किए गए। -डॉ. संजीव गुप्ता, मीडिया प्रभारी, आईएमए