घर, परिवार और समाज में एक लड़के को बचपन से ही कुछ विशेष संस्कार देने के प्रयास अनादि काल से जारी रहे हैं। बालक को संस्कारित किया जाता है कि वह भविष्य में परिवार का नाम रोशन करेगा और जीवन की हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम होगा। इसका परिणाम यह हुआ कि सदियों से पुरुष ने स्वयं अपने बारे में कई आधारहीन धारणाएं बना ली, कई ऐसी जीवनशैलियों को विकसित कर लिया जिनको निभा पाना बहुत कठिन होता है। इन अहंकार पोषण करने वाले उद्देश्यों की पूर्ति के बड़े महंगे परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
विश्व में जो सबसे अधिक मानसिक परेशानियां या रोग विदित हैं उनमें से एक है चिंता।
यह समस्या हालांकि महिलाओं में ज्यादा होती है पर पुरुषों में भी कम नहीं होती है।
पुरुषों के चिंता रोग को लेकर कितने ही भ्रम प्रचलित हैं पर तथ्य तो यह है कि करोड़ों
पुरुष जिसमें बच्चे, युवा और बड़े सभी शामिल हैं इस व्याधि से अपने जीवन काल में कभी
न कभी अवश्य प्रताड़ित रहे हैं हालांकि उनका अहंकार इस सत्य को स्वीकारने नहीं देता
है।
चिंता यानि एंजाइटी कई प्रकार से सामने आती है जिसमें एक रूप होता है बहुत अधिक भयभीत रहता , चिंतित रहता, उसी समस्या के बारे में लगातार नकारात्मक तौर पर सोचते रहना। घबराहट के हालात का बना रहना, सामाजिक प्रतिष्ठा के बारे में चिंतित रहना, अपनों से दूर होने की बेचैनी और तनाव आदि कितनी ही स्थितियां हम अकसर देखते रहते हैं। चिंता व्यक्ति को एक ही कार्य को बार बार करने के किए बाध्य कर सकती है जिसे ओ सी डी कहा जाता है। जीवन में घटित कोई दर्दनाक हादसा भी इंसान को जीवन भर उबरने नहीं देता है और उसे चिंताग्रस्त रखता है। इस विकार को पोस्ट ट्राउमेटिक स्ट्रेस ( सदमा जनित तनाव ) कहा जाता है।
दुनियां में कोई 30 करोड़ लोग अंदाजे से चिंता की उस स्थिति में रहते हैं जिसे मनोविकार कहा जा सकता है। अंदाजतन 24 प्रतिशत प्रतिशत महिलाएं और 15 प्रतिशत पुरुष हर समय चिंताग्रस्त रहते हैं। बच्चों की भी एक अच्छी खासी संख्या तनाव में रहती है। पुरुषों की बजाय महिलाओं की चिंता पर अध्ययन ज्यादा हुआ है। पुरुष के चिंता रोग पर गंभीर अध्ययन न के बराबर हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण पुरुष का अहंकार है तथा परिवार का अस्वीकार्य भाव है। पुरुष और उसका परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा को मद्देनजर रखते हुए इस बात को स्वीकार नहीं करते कि उस परिवार का पुरुष तनावग्रस्त व्यक्तित्व से ग्रसित है। तथ्य के नकारने का फल यह होता है कि असंख्य पुरुष सरदर्द, अनिंद्रा, भोजन की अनिच्छा, शारीरिक कम्पन और अपने आप पर काबू खो देने जैसी स्थितियों से जूझते रहते हैं पर कोई गंभीर सलाह या परामर्श नहीं लेते हैं।
पुरुष को बचपन से ही बताया जाता है कि वह एक सक्षम मर्द है और मर्द को कोई दर्द नहीं होता। परंतु ऐसा है नहीं। महिलाएं अपना दर्द, तनाव, अपनी पीड़ा , चिंता आदि आपस में बांट लेती हैं पर पुरुष सबकुछ छुपाता रहता है। झूठी हंसी, झूठी बहादुरी के भ्रमित परदे के पीछे चिंता और बेबसी को छुपाता रहता है। यह अस्वीकार्य भाव पुरुषों की एक बड़ी संख्या को चिंता से उबरने में सबसे बड़ी बाधा है।
चिंता से मुक्ति संवाद से मिल सकती है। हालांकि संवाद इसे समूल नष्ट नहीं कर सकता पर
मन पर मरहम जैसा कार्य कर सकता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति उस स्थिति में आ सकता है
जहां से नए विचार उसे इतना सबल बना दें कि वह नया रास्ता चुने जहां सफलता की नई संभावनाएं
प्रकट हों। स्वीकार करने का साहस और उस पर संवाद समाज या किसी अन्य झिझक की वजह से
नहीं रोके जाने चाहिएं। समय और जीवनशैली में आ रहे परिवर्तन बता रहे हैं कि दुनिया
को चिंतक, दार्शनिक और पथ प्रदर्शकों की फिर से आवश्यकता पड़ने लगी है पर जीवन की अनावश्यक
भागदौड़ ने इस तरह के लोगों को लुप्त सा प्राणी बना डाला है। आप चाहे पुरुष हों या
महिला पर आप एक जीव हैं। हर जीव के जीवन में चिंता या तनाव स्वाभाविक है इसलिए स्वीकार
कीजिए और उस पर बातचीत, और संवाद कीजिए। साहस सत्य को स्वीकारने में है। जो तथ्य है,
सत्य है उसको नकारना बहादुरी नहीं, नासमझी है या फिर अहंकार।


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