हनुमानगढ ब्यूरो रिपोर्ट। 
सात दिवसीय श्रीमद भागवत कथा व 100 कुंडीय श्री पंचदेव महायज्ञ की पूर्णाहुति हो गई। आयोजन समिति के सदस्य मांगीलाल महिपाल ने बताया कि सातवें दिवस सर्वप्रथम 111 यजमानों द्धारा नित्य पूजन किया गया। इसके बाद श्रीविद्या समाराधक तरूण तपस्वी डॉ. गुणप्रकाश चैतन्य जी महाराज के पावन सानिध्य में 1100 कन्याओं, 108 बटुकों तथा 108 सौभाग्यवती माताओं का पूजन भी हुआ। वहीं, भगवान श्रीकृष्ण-सुदामा सहित विभिन्न प्रसंगों के साथ श्रीमद भागवत कथा के इस दिव्य आयोजन की पूर्णाहुति हो गई। शाम को काशी विश्वनाथ की तर्ज पर हो रही महाआरती के विश्राम उपरांत अखंड भंडारे का आयोजन हुआ। इसी बीच कार्यक्रम के सफल आयोजन पर विशिष्ठ सहयोगियों व समस्त कमेटियों के कार्यकर्ताओं का सम्मान भी किया गया।
इससे पहले कथा व्यास समर्थ श्री त्रंयबकेश्वर चैतन्य जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण-सुदामा का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि मनुष्य का संपूर्ण जीवन अस्ति और प्राप्ति के लिए बीत जाता है। भगवत कथा श्रवण करने से ताप मात्र मिट जाता है। पूज्य गुरूजी ने श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग सुनाया। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह को एकाग्रता से सुना। प्रसंग में कथा व्यास समर्थ श्री त्रंयबकेश्वर चैतन्य जी महाराज ने कहा कि रुक्मणी विदर्भ देश के राजा भीष्म की पुत्री और साक्षात लक्ष्मी जी का अवतार थी। रुक्मणी ने जब देवर्षि नारद के मुख से श्रीकृष्ण के रूप, सौंदर्य एवं गुणों की प्रशंसा सुनी तो उसने मन ही मन श्रीकृष्ण से विवाह करने का निश्चय किया। रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था और अपनी बहन का विवाह चेदिनरेश राजा दमघोष के पुत्र शिशुपाल से कराना चाहता था। रुक्मणी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने एक ब्राह्मण संदेशवाहक द्वारा श्रीकृष्ण के पास अपना परिणय संदेश भिजवाया। तब श्रीकृष्ण विदर्भ देश की नगरी कुंडीनपुर पहुंचे और वहां बारात लेकर आए शिशुपाल व उसके मित्र राजाओं शाल्व, जरासंध, दंतवक्त्र, विदु रथ और पौंडरक को युद्ध में परास्त करके रुक्मणी का उनकी इच्छा से हरण कर लाए। तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने द्वारिका में अपने संबंधियों के समक्ष रुक्मणी से विवाह किया। इस दौरान देशभर से आए विद्धजनों ने की अध्यात्म पर चर्चा।
महाशिवरात्रि महोत्सव आज 
18 फरवरी को धर्मसंघ संस्कृत महाविद्यालय एवं आयुर्वेद रसायनशाला परिसर में महाशिवरात्रि महोत्सव का आयोजन होगा। इसके तहत सुबह सात बजे से मिटटी के सवा लाख शिवलिंग बनाए जाएंगे। इसके बाद समस्त भक्तों के द्धारा शास्त्रीय व वैदिक परम्परा से महाशिवरात्रि की वेला पर रात्रि के चारों प्रहर के अलग-अलग अभिषेक व पूजन अलग-अलग पदार्थों से किया जाएगा। इसमें लाखों की संख्या में भक्तगण भगवान भोलेनाथ का अर्चन करके पुण्य अर्जन करेंगे।