जिस तरह प्रकाश का स्पेक्ट्रम या वर्णक्रम होता है वैसे ही ध्वनि का भी स्पेक्ट्रम होता है जिसमे विभिन्न स्तर की आवाज और उससे उत्पन्न शोर को रंगों का नाम दिया गया है। ध्वनि से उत्पन्न सिग्नल या फ्रीक्वेंसी के आधार पर यह स्पेक्ट्रम तैयार होता है।

ध्वनि को रंगों के आधार पर वर्णित करने की परंपरा सफेद रोशनी के वर्णन के कारण प्रारंभ हुई। जब प्रकाश को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम पर समझा जाता है तो सफेद रोशनी वह होती है जिसमें मानवीय आंखों द्वारा देखी जाने वाली हर प्रकाश किरण का समावेश होता है। इसी आधार पर श्वेत ध्वनि या श्वेत शोर उसे कहा जाता है जो ध्वनि स्पेक्ट्रम की हर सुनी जाने वाली फ्रीक्वेंसी का मिश्रण हो। इसको ब्रॉडबैंड या वायडबैंड भी कहा जाता है।

सफेद प्रकाश की तरह सफेद शोर भी सबसे ज्यादा व्यापक होता है। सफेद शोर को उदाहरण के आधार पर समझने के लिए टीवी और रेडियो की आवाज, पंखे से पैदा हुआ शोर, कमरे के वेंटिलेटर की ध्वनि, तेज वायु प्रवाह के उत्पन्न शोर, तेज बारिश या झरने की आवाज आदि को ध्यान से सुनना चाहिए। 20 हर्ट्ज से लेकर 20,000 हर्ट्ज तक की आवाजें सफेद शोर के दायरे में आती हैं जो कि मनुष्य के कानों द्वारा सुनने वाली हर फ्रीक्वेंसी को सम्मिलित करता है।

सफेद शोर मानव मस्तिष्क को सोने में सहायता करता है। यदि रोशनी को बंद कर दिया जाए और सफेद शोर को निम्न फ्रीक्वेंसी पर पैदा किया जाए तो यह वातावरण मानव मस्तिष्क को शांत कर देता है जिसके कारण नींद के हार्मोन स्त्रावित होते हैं और व्यक्ति गहरी नींद में जा सकता है। इस सिद्धांत के आधार पर कुछ यंत्र भी बने हैं पर वे अभी तक प्रारंभिक अवस्था में ही हैं क्योंकि अभी तक इस क्षैत्र में गंभीर प्रयास नहीं हुए हैं। मोटे तौर पर कुछ अध्ययन बताते हैं कि एयर कंडीशनर से उत्पन्न या फिर एग्जास्ट पंखे की आवाज से कई लोग ज्यादा बेहतर सोते हैं। बच्चे तो लोरी से निश्चित रूप से बेहतर और शीघ्र सोते हैं।

 सफेद शोर के अलावा जो अन्य ध्वनियों के प्रकार होते हैं वे गुलाबी, लाल, नीला, हरा, भूरा और काला शोर होते हैं। गुलाबी शोर सफेद शोर के समान ही होता है पर यह सफेद से गहरा होता है जिसमें ऊंची फ्रीक्वेंसी की शक्ति कम हो जाती है और नीची फ्रीक्वेंसी ज्यादा प्रधान हो जाती है। इसका उदाहरण हृदय की धड़कन, किनारे से टकराती समुद्र की लहरों की आवाज, लगातार इकसार बरसती बारिश या फिर पत्तियों के हिलने से पैदा हुआ शोर।

 लाल ध्वनि का शोर गुलाबी से कुछ हल्का होता है और मन को सुहाना लगता है। नीला शोर संगीत में काम आता है  जहां ध्वनि में कम्पन पैदा किया जाता है। हरा शोर अस्तित्व की ध्वनि है, पूरे विश्व का बैकग्राउंड संगीत है। मनुष्य की बसावट से दूर किसी शांत स्थान पर ध्यान में बैठ कर आप ब्रह्मांड की गति की ध्वनि को सुनने का प्रयास कर सकते हैं जो एक हुम सा अहसास है जिसको शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है बस महसूस किया जा सकता है। ग्रे या भूरा म्यूजिक उच्च फ्रीक्वेंसी शोर है जो आप कॉन्सर्ट के हंगामे, विवाहोत्सव, धार्मिक उन्माद आदि में सुनते है जहां लोग शोर शराबे के बीच शांति की असफल उम्मीद करते हैं। यही कारण है कि इन तीनों और ऐसे अन्य समारोहों की परिणीति अक्सर हिंसा या विवाद में ही होती है। काला शोर याने मौन स्थिति जहां कुछ भी सुनाई न दे जैसे की सन्नाटे की स्थिति।

आवाज हमारे तन और मन दोनों को प्रभावित करती है। बिना साइलेंसर की मोटरसाइकिल, वाहनों के कर्कश भूरे शोर वाले हॉर्न, चीखते चिल्लाते लोग आदि सब शरीर और मन पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, आपकी बौद्धिक क्षमताओं का संकुचन करते हैं, ध्यान को कमजोर बनाते हैं और आपके विकास की सीमाओं को कम करते हैं। ध्वनि प्रदूषण भी अन्य प्रदूषणों की तरह नियंत्रित होना चाहिए। शाम का समय शांति का समय होना चाहिए पर हम तथाकथित धर्म स्थलों से जो पागलों की तरह शोर पैदा करते हैं उसका कोई तर्क थोड़े ही है। यह सब मूढ़ता से भरा अहंकार का ऐलान मात्र है जो सिर्फ विभक्ति का बीज बोता है।